मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहु मानयन् ।
वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ।।
अर्थ : समस्त भूत-प्राणियोंमें सर्वेश्वर भगवानने ही अपने अंशभूत जीवके रूपमें प्रवेश किया है, यह मानकर सब प्राणियोंको अत्यंत आदर देते हुए सबको मन ही मन प्रणाम करना चाहिए ।
भावार्थ : वैदिक संस्कृतिमें जब हम किसीको नमस्कार करते हैं तो हमारा मनोभाव यही होता है कि हम अपने समक्ष जो भी व्यक्ति है उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा स्वरूपी दिव्यताको नमन करते हैं, इससे ही हमारी संस्कृतिकी श्रेष्ठता सिद्ध होती है । – तनुजा ठाकुर