‘सन्तोंका संग’ यह सर्वश्रेष्ठ स्तरका सत्संग माना गया है, सन्त यदि वाणीसे कुछ न भी बोलेंं तो भी उनके शरीरसे प्रक्षेपित होनेवाले सूक्ष्म स्पन्दनोंके विकिरणसे सामान्य व्यक्तिके चारों सूक्ष्म देहोंकी (मनोदेह, वासना-देह, कारण-देह, महाकारण-देह) शुद्धि होती है एवं सन्तोंकी आज्ञापालन कर, साधना करनेसे जीवके संचित कर्म नष्ट होने लगते हैं; अतः सन्तोंको परब्रह्मकी उपाधि दी गई है । शास्त्रोंमें भी सन्तोंके संगतकी महिमाका गुणगान करते हुए कहा गया है –
यथा वह्नि प्रसंगाच्च मलं त्यजति कांचनम् । तथा सतां हि संसर्गात् पापं त्यजति मानवः ।।
अर्थात जैसे सुवर्ण अग्निके सम्पर्कमें आनेपर मैल त्याग देता है, उसीप्रकार सन्तोंका संग करनेसे, पाप उस मनुष्यका परित्याग कर देता है । – तनुजा ठाकुर