
कल किसी व्यक्तिका संगणकीय संपत्र (मेल) आया । उन्होंने लिखा है कि मैं आपको गुरु स्वरुपमें देखता हूं, आपके जालस्थल और यू ट्यूबपर नित्य विडियो देखता हूं, आपकेध्वनिमें ध्वनिमुद्रित दत्तका जप लगाकर उसे भी नित्य करता हूं , मैं आपको एक सहस्र(हज़ार) रुपये भेज रहा हूं, आप उसके चप्पल क्रय कर लें, ऐसी मेरी इच्छा है ! देखिये, कलियुगी शिष्य अर्पण करनेपर उसका क्या करना चाहिए, उसका दिशा निर्देश भी देते हैं ! वस्तुतः एक बार आपने कुछ भी अर्पण कर दिया तो उस धनका क्या करना है यह जिन्हें अर्पण दिया, उस पर छोड दें और वैसे भी धनका त्याग धनकी आसक्ति छोडने हेतु करते हैं, उस धनका क्या करना है, एवं उसका क्या हुआ होगा, यदि यह विचार किया तो वह त्याग, त्याग हुआ क्या ! – तनुजा ठाकुर (२७.१.२०१५)