यूरोपके एक मंदिरमें जब मैं प्रवचनमें गयी तो वहां महिलाओंकी भजन मंडली, ‘सत्संगके बिना मेरे दिल न लगे’ यह भजन गा रही थीं, मुझे उसी समय प्रवचन लेने थे, किन्तु भजन मंडलीकी सदस्याएं मेरे समक्ष अनेक देवी-देवताओंके भजन गाती रहीं, मैंने उन्हें दो बार कहा भी कि प्रवचनका समय हो रहा है, मुझे बोलने दें, किन्तु वे भजन गानेमें व्यस्त रहीं, उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि वे तो प्रतिदिन भजन करती ही हैं आज कोई प्रवचनके माध्यमसे उन्हें धर्म विषयक कुछ ज्ञान देनेवाले हैं तो आज भजन न कर उनसे कुछ सीखनेका प्रयास करना चाहिए; अंतत: मुझे ही उन्हें निर्लज्ज होकर कहना पडा कि मैं भारतसे इतना दूर आपको सत्संग सुनाने आई हूं, आपके मंदिरमें आजका सत्संग नियोजित है, यह भी आपको ज्ञात है और आप उस समय अपने नियमित भजन गाकर मेरा और अपना दोनोंका समय व्यर्थ कर रही हैं, यदि आपको सत्संग सुननेमें कोई रुचि नहीं तो आप इसी अर्थका भजन क्यों गाती हैं ? तब उन्हें अपनी चूक ध्यानमें आई ।
भजन मंडलियोंकी स्थिति रट्टू तोते समान हो जाता है, जहां किसी भी भजनके अर्थको आत्मासात करनेका सामान्यत: प्रयास नहीं किया जाता है। जैसे कोल्हूका बैल एक ही खूंटेमें बंधकर गोल-गोल घुमते रहता है; थकावटके कारण उसे ऐसा लगता है कि उसने बडी लम्बी दूरी तय की है, वैसे ही भजन मंडलीमें सलग्न लोगोंको लगता है कि भजनसे उनकी आध्यात्मिक प्रगति होती है; किन्तु जिस कक्षामें कोई शिक्षक न हो, उसमें पढनेवाले विद्यार्थीकी कभी प्रगति नहीं हो सकती है उसी प्रकार भजन मंडलियोंमें भी कोई सिखानेवाले नहीं होते; अतः उनकी स्थिति बिना शिक्षकके अनुशासनहीन बच्चों समान होती है और वे सदैव अज्ञानतामें ही रहते हैं; किन्तु उन्हें लगता है कि वे उच्च कोटिके भक्त हैं। तनुजा ठाकुर (५.७.२०१५)