सकामसे निष्काम साधनाका प्रवास
वैसे तो निष्काम साधनाको संतोंने और धर्म शास्त्रोंने श्रेष्ठ प्रकारकी साधना कहा है किन्तु एक सामान्य साधक सकाम साधनासे ही निष्काम साधना की और बढ़ता है अतः अध्यात्मिक यात्रामें सकाम साधनाका भी अपना महत्व है। उदाहरण के रूप में यदि कोई व्यक्ति कुछ भी साधना नहीं करता और उसके जीवनमें कोई ऐसा कष्ट है जिसका निराकरण वह अत्यधिक प्रयास कर भी कर नहीं कर पाता है और ऐसे में यदि वह, कोई मंदिरमें, या किसी तीर्थक्षेत्र, या किसी संत या गुरुके आश्रममें जाता है और वहांसे उसकी साधना आरभ होती है और इसी क्रममें उसकी मांगी हुई इच्छा पूर्ण हो जाती है तो इससे, उस साधकको, उस इष्टके प्रति विश्वास निर्माण हो जाता है और वह उसकी आराधना और भी श्रद्धापूर्वक करने लगता है। साधनाकी वृद्धि होनेपर उसे और भी अनुभूतियांं होती है और इससे उसका विश्वास श्रद्धामें परिवर्तित हो जाता है ! धीरे-धीरे वह अपने आराध्यसे निष्काम भावसे प्रेम करने लगता है ! – तनुजा ठाकुर (१३..२.२०१२)