एक साधकने पूछा है कि मैं साधकोंसे चूक होने पर डांटती क्यों हूंं ?


Scolding

मैं धर्म सिखाती हूं और उत्कृष्ट कृति करनेपर परितोषिक प्रदान करना और अयोग्य करनेपर दंड देना यह धर्मसिद्धांत है ! मैं मात्र इस सिद्धान्तका पालन गुरु आज्ञा मानकर करती हूंं ! हमारे दोष शत्रु होते हैं और दोषोंके कारण चूक होती हैं अतः दोषोंके प्रति तटस्थ होकर व्यवहार करने से हमारी आध्यात्मिक प्रगति अतिशीघ्र होती है जब मुझसे कोई चूक होती है तो मैं भी अपने मनको दंड देने के लिए कठोर प्रायश्चित लेती हूंं जिससे कि मन दूसरी बार वही चूक करने से पहले दस बार सोचे ! इस प्रकार बुद्धिके माध्यमसे हम अपनी इंद्रियों का निग्रह कर सकते हैं आरंभ में यह साधकों से यह नहीं होता अतः चूक होने पर दीदी डांंटेंगी यह आपके मनको पता चल जाता है और मन सतर्क होकर सेवा करता है एक बार यह सेवा (मनको डांटनेका ) आप स्वयं करने लगे तो मैं यह सेवा भी आपको सौंप दूंंगी और आप पाएंगे की मैं आपको कभी डांटती ही नहीं। मेरे श्रीगुरुने मुझे कभी नहीं डांटा क्योंकि मैं अपने मनके साथ सदैव निर्दयी रही हूंं ! मैं साधकोंसे पहली कुछ बार चूक होने पर नहीं डांटती हूंं और प्रेमसे चूक सुधारने हेतु प्रयास करती हूंं परंतु यदि साधकमें सुधार न हो तो उसे अपना समझ डांटती हूंं – तनुजा ठाकुर



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution