१. मेरे श्रीगुरुने मुझे जो भी शब्दजन्य एवं शब्दातीत ज्ञान दिया है, उसके लिए उन्होंंने कभी एक पैसा भी नहीं मांगा, तो मैं कैसे लूं ?
२. अध्यात्मका खरा ज्ञान देनेवाले कभी पैसेकी मांग नहीं करते, उनकी झोलीमें जो स्वेच्छासे दे दें, उसे वे स्वीकार कर लेते हैं !
३. अध्यात्मकी सीख पैसेसे नहीं मिल सकती और न ही दी जा सकती है । उसके लिए सेवा, प्रेम, त्याग और सम्पूर्ण शरणागतिकी आवश्यकता होती है ।
४. जो पैसे लेकर सिखाते हैं, उन्हें आचार्य या कथावाचक कहते हैं । मैं एक साधक हूंं, साधना करना और साधना सिखाना मेरा धर्म है ।
५. मूलत: भिक्षुणी हूं, गुरुकार्य हेतु आवश्यकता पडनेपर भिक्षाटन करती हूं, परन्तु यदि भिक्षुक मुंह खोलकर निश्चित राशिकी मांग कर ले तो वह भिक्षुक कैसा ?!
६. समाजमें यह अनुचित (गलत) धारणा है कि जो भी प्रवचन करते हैं, निश्चित शुल्क लेते हैं ! इस धारणाको भी तोडना, यह मेरा धर्म है !
७. शिष्यकी साधना पूर्ण होनेपर गुरु गुरुदक्षिणाकी मांग करते हैं । मेरे श्रीगुरुने तो वह भी नहीं मांगा, मैंने जो तिनका भर अर्पण किया उसके स्थान पर अनमोल धन ‘गुरुकृपा’ उन्होंने दे दी , समाजमें इस धारणाको स्थापित करना है । -तनुजा ठाकुर
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