मेरे लेखोंके एक पाठकने पूछा है कि आप यदि मात्र हिन्दुओंसे ही प्रेम करेंगींं तो प्रत्येक जीव मात्रसे प्रेम कैसे कर पाएंगी और सर्वत्र ब्रह्मकी प्रतीति कैसे होगी ?
उत्तर अत्यन्त सरल है । सधानाके दो अंग होते हैं, एक होता है ‘व्यष्टि साधना’ और दूसरा ‘समष्टि साधना’ । साधनाके दोनों अंगोंमें सामंजस्य बनानेपर ही सायुज्य मुक्ति (सर्वेश्रेष्ठ मुक्ति ) सम्भव है । व्यष्टि स्तरपर प्रत्येक जीव मात्रमें ईश्वरके निर्गुण स्वरुपका बोध कर, उनसे प्रेम करना और उनकी सेवा करना, यह मेरा व्यष्टि धर्म है और अति उच्च कोटिके प्रगत विज्ञान सम्मत अध्यात्मशास्त्रका पोषण करनेवाले वैदिक सनातन धर्मका रक्षण करना हमारा समष्टि धर्म है ।
वैदिक सनातन धर्मके सिद्धान्त अनुसार “सर्वेषां अविरोधेन” अन्तर्गत प्रत्येक उपासना पद्धति एवं साधना मार्गका आदर करना, हमारे संस्कारोंमें निहित है; परन्तु कोई हमारे धर्मकी ग्लानि करे, हमारे भारत माताकी विडम्बना करे और हमारी संस्कृतिका अपमान करे, ऐसे अधर्मियोंका साम, दाम, दण्ड, भेदका मार्ग अपनाकर, दण्डित करना हमारा समष्टि धर्म है ।
मात्र व्यष्टि साधनाका आधार रहनेपर जैसे एक मां अपने बच्चेको प्रेमवश दण्डित कर, उसे अनुशासित करती है, उसी प्रकार दुर्जनको दण्ड देकर उसे और अधिक पापकर्म करनेसे बचाना और अन्य दुर्जनोंको अधर्मके पथसे च्युत करना, हमारा प्रथम कर्तव्य है ।
आदिगुरु शंकराचार्यने यद्यपि ‘ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या’का सिद्धान्त प्रतिपादित किया; परन्तु जब एक स्थानपर कापालिकोंका (एक प्रकारके अघोरी तन्त्र उपासक) आतंक देखा तो उन्होंने उसी समय साधकोंकी सेना तैयार कर उन कापालिकोंको दण्डित किया; परन्तु इस सन्दर्भमें गांधीजीने अत्यन्त भयंकर चूकें कीं, वे व्यष्टि और समष्टि साधनाके समुचित दृष्टिकोणको नहीं समझ पाए और फलस्वरूप आज हिन्दू बहुल भारतवर्ष, उनकी करनीका दण्ड भोग रहा है । गांधीजीकी यह चूक, उनके आध्यात्मिक पतनका कारण तो बनी ही, साथ ही यदि उन्होंने भी सनातन धर्मका रक्षण किया होता तो वे भी महर्षि अरबिन्दो घोष जैसे बन सकते थे; किन्तु उन्होंने तो महात्मा शब्दको भी कलंकित किया ! अतः व्यष्टि स्तरपर बिना किसी भेदभावके सबसे प्रेम करना और समष्टि स्तरपर मानव मात्रके कल्याण हेतु हिन्दू एवं हिन्दू धर्मका रक्षण अति आवश्यक है, तभी हम खरे अर्थमें आध्यात्मिक कहलानेके अधिकारी हो सकते हैं । – तनुजा ठाकुर
absolutely right .thanks
बहुत ही सरल शब्दों में आपने इतनी गूढ़ बात समझा दी है| धन्यवाद !