उद्यन्तु शतमादित्या उद्यन्तु शतमिन्दव
न विना विदुषां वाक्यैर्नश्यत्याभ्यन्तरं तमः ॥ – सभारञ्जन शतक अर्थ : चाहे सौ सूर्य उदित हो जाये या सौ चंद्रमा; परंतु ज्ञानीके शब्द सुने बिना आंतरिक अंधकार दूर नहीं हो सकता |
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