एक संतने कहा है
सतसंगत को जाईये, तज मोह अभिमान ।।
ज्यों ज्यों पग आगे बढे , कोटि यज्ञ सामान ।। अर्थात सत्संगकी ओर बढनेवाले प्रत्येक कदम कोटि-कोटि यज्ञका फल देता है।
साधनामें प्रयत्नपूर्वक किये गए नामजपका कुल महत्व ५%, सत्संग एवं संत सान्निध्यका महत्व ३०% एवं सत्सेवाका महत्व १००% है।
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