
प्रश्न : आपके, मेरे घरसे प्रस्थानके तीसरे दिवससे मैंने एक माला श्रीगुरुदेव दत्तकी तीन माला जप आरम्भ किया, अगले दो दिवस आठ और नौ माला जप किए । उसे अगले दिवस पांचवीं माला करते-करते सिरको झटका लगा और मंदिरमें ही पन्द्रह मिनटतक नींद आ गई, क्या आसुरी शक्तियां इतना शक्तिशाली होती हैं ? – प्रकाश चानना, जर्मनी
यदि हमारे घरमें अतृप्त पितरोंका कष्ट हो और हम उसके निवारण हेतु श्रीगुरुदेव दत्तका जप आरम्भ करें तो जपके आरम्भिक कालमें वे अल्पप्रमाणमें अडचनें निर्माण कर सकती हैं या हमें कष्ट दे सकती हैं । जपके आरम्भिक चरणमें आपको कष्ट होनेका अर्थ ही है कि आपकी साधनाकी दिशा योग्य है; अतः दृढतापूर्वक जप करनेका प्रयास करें ! यदि हम अनेक पीढियोंसे पितरोंके लिए शास्त्रानुसार धर्मपालन नहीं करते हैं तो हमारे पितर, हमसे अत्यधिक क्रोधित हो जाते हैं और वे हमारे और हमारे कुलके नाश करनेका नियोजन कर चुके होते हैं, ऐसेमें जब हम उनकी सद्गति हेतु कुछ उपाय करते हैं तो वे और क्रोधित होकर हमें कष्ट देने लगते हैं, जिससे कि हम उनके नियोजनमें हस्तक्षेप न कर सकें ! जपके आरम्भिक कालमें वे कष्ट देकर यह कहना चाहते हैं कि अभीतक हम सबका ध्यान उनकी ओर क्यों नहीं था ?; परन्तु यदि हम दृढतापूर्वक जप करनेका प्रयास करते रहते हैं तो उन्हें विश्वास हो जाता है कि हम उनकी सद्गतिके विषयमें गंभीरतासे कुछ उपाय कर रहे हैं और वे हमें कष्ट देना छोड देते हैं । इतना ही नहीं जब हम ऐसे अतृप्त पूर्वजोंको गति देते हैं और जब उन्हें गति मिलनेवाली होती है तब वे हमें अत्यधिक आशीर्वाद देकर जाते हैं । साथ ही कुछ पूर्वज यदि कोई बलाढ्य आसुरी योनि जैसे ब्रह्म-राक्षस, ब्रह्म-पिशाचमें होते हैं और उनकी प्रवृत्ति दुष्ट होती है और उनकी सद्गति हेतु सतत् साधना करनेपर भी यदि वे हमें कष्ट देते हैं तो दत्तात्रेय देवता ऐसे पूर्वजोंको दण्डित करते हैं !
हां ! अतृप्त पूर्वजकी यदि अच्छी साधना हो और कोई विशेष इच्छा पूर्ति न होनेके कारण यदि उन्हें गति न मिली हो और उनके अनेक बार संकेत देनेपर भी हम उनकी गतिके लिए प्रयास न करें, तो वे अपनी साधनाके बलका उपयोग हमें कष्ट देनेमें करते हैं । साथ ही अनेक बार सूक्ष्म जगतकी बलाढ्य आसुरी शक्तियां भी हमारे पूर्वजोंको अपने नियन्त्रणमें कर लेती हैं और वे ही हमारे अतृप्त पूर्वजोंको हमें कष्ट देने हेतु काली शक्ति प्रेषित करती हैं ।
रथीसे रथी और महारथीसे महारथीका युद्ध, यह तो चिरंतन कालसे चला आ रहा है । स्वयं अवतारोंको भी आसुरी शक्तियोंने यह जानते हुए भी कि वे परमेश्वर स्वरुप हैं, उन्हें कष्ट दिया है, तो हम और आप क्या हैं ? साधना अर्थात् मनुष्यत्वसे देवत्वकी ओरका प्रवास है अथात् एक प्रकारका देवासुर संग्राम है !- तनुजा ठाकुर
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