ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते ।
इह क्लेशाय तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ।। – महाभारत (१२.३२९.२२)
अर्थ : ब्राह्मणका देह सुखोपभोगके लिए उत्पन्न नहीं हुआ । इहलोकमें क्लेश भोगकर तपाचरण करनेके लिए ब्राह्मणका जन्म हुआ है । ऐसा करनेपर ही जीवको निरुपम सुख प्राप्त होगा । इस शास्त्रवचनके आधारपर यह कहा जा सकता है कि तप करने हेतु ही ब्राह्मण वर्णके लोगोंका जीवन समर्पित था और है । सर्वप्रथम ब्राह्मण रुपी साधक जीव, साधना कर आत्मज्ञानी बनता है, तत्पश्चात् अपने तपसे अर्जित फलको समष्टि हितार्थ उपयोगमें लाने हेतु उसे निष्काम भावसे समाजको अर्पित करता है । प्राचीन कालसे हमारे ऐसे अनेक ‘कर्म ब्राह्मणों’ने वैदिक धर्ममें अनेक दिव्य मन्त्रों, दर्शनों, धर्मसिद्धान्तोंका प्रतिपादन कर इसकी धरोहरको संजोनेके साथ ही उसके ज्ञानमें निरन्तर वृद्धि कर उसे एक अगाध सागरका रूप दे दिया है; अतः वे पूजनीय रहे हैं एवं समय-समयपर अपने ब्राह्मतेज और क्षात्रतेजके अद्भुत सामंजस्यसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको आलोकित भी किए हैं; किन्तु जबसे ब्राह्मणोंको अपने इस मूल लक्ष्यका विस्मरण हो गया तबसे समाजमें उनका पतन आरम्भ हो गया । वस्तुत: हमारी संस्कृतिमें ब्राह्मण वर्णके कर्तव्य इतने श्रेष्ठ और कठोर थे कि उसका पालन करना सामान्य व्यक्तिके लिए अत्यन्त कठिन था और इसप्रकार कर्म ब्राहमण अपने जन्मके कारण नहीं; अपितु अपने दैवी कर्मोंके कारण समाजमें वन्दनीय थे और आज भी हैं । – तनुजा ठाकुर
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