स्वतन्त्रता पश्चात् यदि वैदिक धर्मशास्त्रोंके अभ्यासको शिक्षण प्रणालीमें अन्तर्भूत किया जाता तो आज अनेक जन्म हिन्दू जो ब्राह्मण भोजनके औचित्यपर प्रश्नचिन्ह उठाते हैं वे ऐसा नहीं करते । मनुस्मृतिके तृतीय अध्यायमें ब्राह्मण भोजनका महत्त्व बताते हुए मनु महाराज कहते हैं –
यद्यद्ददाति विधिवत्सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ।।
अर्थात्: ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक तथा विधि अनुसार जो कुछ भी पितरोंके लिए दिया जाता है, उससे परलोकमें पितरोंको अन्त न होनेवाली तथा सदा रहनेवाली तृप्ति प्राप्त होती है ।
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देवताओंके लिए जो हव्य और पितरोंके लिए जो कव्य दिया जाता है, ये दोनों देवताओं और पितरोंको कैसे मिलता है ? इसके सम्बन्धमें यमराजने अपनी स्मृतिमें कहा है –
यावतो ग्रसते ग्रासान् हव्यकव्येषु मन्त्रवित् । तावतो ग्रसते पिंडान शरीरे ब्रह्मण: पिता ।।
अर्थात् : मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण श्राद्धके अन्नके जितने कौर अपने पेटमें डालता है, उन कौरोंको श्राद्धकर्ताका पिता ब्राह्मणके शरीरमें स्थित होकर पा लेता है । –तनुजा ठाकुर
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