जननी और जन्मभूमि है स्वर्गसे भी महान
आज अनेक हिन्दू मात्र क्षणिक सुखप्राप्ति हेतु मलेच्छोंके देशके बाहरी ऐश्वर्यसे आकर्षित होकर, भारत जैसे आध्यात्मिक देशका परित्याग कर देते हैं । विदेशमें न तो आध्यात्मिक दृष्टिसे पोषण होता है और न ही लौकिक दृष्टिसे कुल, गोत्र, प्रवरकी कोई परम्परा रह पाती है अर्थात वहां स्थायी निवास करनेपर वंश-परम्परा नष्ट हो जाती है, वहां तो लोग मात्र अपने सुख-ऐश्वर्यकी संकुचित मनोवृत्तिसे ही अपना जीवनयापन करते हैं ।
ऐसे भोगी लोग, जो अपनी मातृभूमिका परित्याग क्षणिक सुखके लिए करते हैं, उनके लिए यह श्लोक अत्यन्त प्रेरणादायी सिद्ध हो सकता है, जिसमें प्रभु श्रीराम लक्ष्मणसे कहते हैं –
पितृपूर्वार्जिता भूमिर्दरिद्रादपि सुखावहा ।
अपि स्वर्णमयीं लंका न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।
अर्थात अपने पिता-पितामहकी भूमि सम्पन्न न होनेपर भी सुखदायिनी होती है । लक्ष्मण ! यद्यपि यह लंका सोनेकी है, तथापि मुझे प्रिय नहीं । मुझे तो माता और मातृभूमि, स्वर्गसे भी अधिक प्रिय हैं ।– तनुजा ठाकुर
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