सन्त कबीरने कहा है कि ‘परमारथके कारने साधून धरा शरीर’, यथार्थमें सन्त शरीर धारण ही करते हैं जीवोंके उद्धार हेतु, वे दूसरोंके दुःखसे दु:खी एवं दूसरोंके सुखसे सुखी हो जाते हैं । दूसरोंके सुख ही उनके जीवनका उद्देश्य होता है; वे ही हमारे खरे आदर्श होते हैं । वे परहित हेतु अनेक प्रकारके दुःख सहन कर भी सतत् आनन्दी रहते हैं, यह उनकी विशेषता होती है तभी वे पूजनीय भी होते है । यह सन्तोंके अस्तित्वकी ही महिमा है कि यह वसुन्धरा इतने पापियोंके रहते हुए भी, उनके तपोबलके कारण टिकी हुई है तभी तो शास्त्रोंमें कहा गया है –
परतापच्छिदो ये तु चन्दना इव चन्दनाः ।
परोपकृतये तु पीड्यन्तेकृतिनो हि ते ॥
संतस्त एव ये लोके परदुःखविदारणा: ।
आर्तानामार्तिनाशार्थं प्राणा येषां तृणोपमाः ॥
तैरियं धार्यते भूमिर्नरै: परहितोद्यतै: ।
मनसो यत्सुखं नित्यं स स्वर्गो नरकोपमः ॥
तस्मात् परसूखेनैव साधवः सुखिनः सदा ।
अर्थात् जो चन्दन वृक्षकी भांति दूसरोंके तापको दूर करके उन्हें आह्लादित करते हैं तथा जो परोपकारके लिए स्वयं कष्ट उठाते जो दूसरोंके दुःखोंका नाश करते हैं, वे ही सन्त हैं तथा पीडित जीवोंकी पीडा दूर करनेके लिए जिन्होंने अपने प्राणोंको तिनके समान न्यौछावर कर दिया है । जो मनुष्य सदा दूसरोंकी भलाईके लिए प्रयत्नशील रहते हैं, उन्होंने ही इस पृथ्वीको धारण कर रखा है । जहां सदा अपने मनको ही सुख मिलता है, वह स्वर्ग भी नरकके समान है; अतः साधु पुरुष सदा दूसरोंके सुखसे ही सुखी होते हैं।- तनुजा ठाकुर
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