जैसे दूध, दही या मलाईको (सन्तानिकाको) मथनेपर मक्खन निकलता है वैसे ही मन, बुद्धि और अहंके मंथनसे मोक्ष प्राप्त होता है; परन्तु ईश्वर या सद्गुरु जब साधकके साथ यह मंथनकी प्रक्रिया करते हैं तब उससे पीडा होती है । ऐसी स्थितिमें जो सद्गुरुके चरणोंका ध्यानकर, इस वेदनाप्रद प्रक्रियाको सहन करता है, उसे निश्चित ही ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति होती है । मात्र, कभी-कभी इस मंथनके समय शिष्य विचलित हो जाता है तब सद्गुरु उसे अनुभूति भी देते हैं । जैसे कुम्हार गीली मिट्टीसे बर्तन बनाते समय ऊपरसे तो थाप लगाता है; परन्तु अन्दरसे अपने हाथका आधार भी देता है, उसीप्रकार सद्गुरु, ऊपरकी थापके साथ अन्दरसे उस पीडाको झेलनेके लिए आत्मशक्ति और अनुभूति भी देते हैं, मात्र आवश्यकता है गुरुद्वारा की जा रही प्रक्रियापर अनन्य श्रद्धा की । – तनुजा ठाकुर
दीदी आपकी लेख अच्छा लगा इसमें सीखने हेतु बहुत कुछ है