निर्विकल्प समाधि साध्य करना, यह प्रत्येक साधकका लक्ष्य होता है और यह देहधारी जीवके लिए प्राप्त होनेवाली सर्वोच्च अवस्था होती है । इसे प्राप्त करने हेतु साधकमें मुमुक्षु एवं शिष्यके सर्व गुण होने आवश्यक हैं । इस स्थितिको साध्य करने हेतु अर्जुन समान एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्यके प्रति पूर्ण समर्पित होकर अखण्ड साधनारत रहना पडता है और जब जीव पूर्ण निस्पृह होकर सतत् कर्मरत रहता है तो वह स्थिति साध्य हो जाती है; परन्तु इस स्थितिको अनेक कोटिमें कोई एक साधक ही साध्य कर पाता है, इससे समझमें आता है कि माया अपना कार्य कितनी निपुणतासे करती है और जीवको बद्ध रहने हेतु सतत् किसप्रकार प्रयत्नशील रहती है । साधकको भी उसी सतर्कतासे एक योद्धा समान सतर्क होकर अपने ध्येयकी प्राप्ति हेतु एकनिष्ठ होकर प्रयासरत रहना पडता है तभी मन आत्मतत्त्वकी प्रतीति ले सकता है । विवेकचूडामणिमें साधनामें दृढता एवं लगनकी परिणति किसप्रकार होती है इस सन्दर्भमें कहा गया है –
पक्वम् मनो ब्रह्मणि लीयते यदा ।
तदा समाधि: स विकल्पवर्जित: ।
स्वतोsद्वयानन्दरसानु भावक: ।।
अर्थात् जिस समय रात्रि-दिवसके निरन्तर अभ्याससे परिपक्व होकर मन ब्रह्ममें लीन हो जाता है, उस समय अद्वितीय ब्रह्मानन्द रसका अनुभव करनेवाली, वह निर्विकल्प समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है ।-तनुजा ठाकुर
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