धर्मयात्राके मध्य जब मैं विदेशमें अनेक देशोंमें गई तो मात्र शोध हेतु वहांके सुप्रसिद्ध विपणि (बाजारों) को देखने हेतु गई कि सम्पूर्ण विश्वके लोग और विशेषकर भारतके हिन्दू वहां क्यों वस्तु क्रय करने हेतु जाते हैं ? मैं तो वहांके ‘बाजार’, हाट या ‘मॉल’में मात्र बीस मिनिटोंमें ही मैं थककर चूर हो जाती थी क्योंकि वहांके आपणिमें (वस्तु भण्डारों, दूकानोंमें) जो वस्तुएं विक्रय हो रही थीं, वे सब तमोगुणी हुआ करते थीं और मुझे ढूंढनेपर भी कोई सात्त्विक वस्तु दिखाई नहीं देती थी, जिसे क्रय किया जा सके और उन तमोगुणी वस्तुओंसे सूक्ष्म काली शक्तिका इतने बडे प्रमाणमें प्रक्षेपण होता था कि मेरी प्राणशक्ति अत्यधिक तीव्र गतिसे उनका प्रतिकार करनेमें नष्ट हो जाती थी । इससे मुझे ज्ञात हुआ कि हिन्दुओंको सत्त्व, रज, तमका अभिज्ञान नहीं होनेके कारण ही वे विदेशी तामसिक वस्तुओंको क्रय करते हैं। इससे पुनः ज्ञात हुआ कि आज सम्पूर्ण विश्वको सनातन धर्मकी विशेषता बतानेकी अत्यधिक आवश्यकता है और विशेषकर हिन्दुओंको धर्मशिक्षण देकर साधना करवाना अति आवश्यक है तभी उनकी सूक्ष्म इन्द्रियां जागृत होंगी और वे तामसिक वस्तुओंका उपयोग करना टालेंगे – तनुजा ठाकुर
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