साधनाकी सर्वोच्च स्थिति हेतु लगनसे अभ्यास आवश्यक
पक्वम् मनो ब्रह्मणि लीयते यदा
तदा समाधि: स विकल्पवर्जित:
स्वतोsद्वयानन्दरसानु भावक: – विवेकचूडामणि (३६३)
अर्थ : जिस समय रात्रि –दिवसके निरंतर अभ्याससे परिपक्व होकर मन ब्रह्ममें लीन हो जाता है उस समय अद्वितीय ब्रह्मान्दरसका अनुभव करनेवाली वह निर्विकल्प समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है ।
भावार्थ : निर्विकल्प समाधि साध्य करना यह प्रत्येक वेदान्तमार्गी साधकका लक्ष्य होता है और यह देहधारी जीवके लिए प्राप्त होनेवाली सर्वोच्च अवस्था होती है । इस प्राप्त करने हेतु साधकमें मुमुक्षु, साधक एवं शिष्यके सर्व गुण होने आवश्यक हैं । इस स्थितिको साध्य करने हेतु अर्जुन समान एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्यके प्रति पूर्ण समर्पित होकर अखंड साधनारत रहना पडता है और जब जीव पूर्ण निस्पृह होकर सतत कर्मरत रहता है तो वह स्थिति साध्य हो जाती है; परंतु इस स्थितिको सौ कोटिमें कोई एक साधक ही साध्य कर पाता है, इससे समझमें आता है कि माया अपना कार्य कितनी निपुणतासे करती है और जीवको बद्ध ही रहने हेतु प्रयत्न करती है । साधकको भी उसी सतर्कतासे एक योद्धा समान सतर्क होकर अपने ध्येयकी प्राप्ति हेतु एकनिष्ठ होकर प्रयत्नशील रहना पडता है । – तनुजा ठाकुर
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