एक साधकको बेसनके पदार्थका सेवन करना वैद्यने वर्जित किया था; किन्तु पथ्यके रहते हुए, वह मात्र अपनी जिह्वाकी तृप्ति हेतु अल्पाहारमें आवश्यकतासे अधिक प्रमाणमें बेसनके पकौडे ग्रहण कर रहा था, वहीं एक दूसरे साधकने उसे ऐसा करते हुए देखा जिन्हें उनके पथ्यके विषयमें जानकारी थी, तब भी उन्होंने उसे नहीं रोका, यद्यपि उन दोनों साधकोंके मध्य आत्मीयता है । जब मैंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों नहीं किया ? तो वे कहने लगे कि मैंने सोचा कि ऐसा करनेसे उन्हें बुरा लगेगा; अतः मैंने संकोचवश ऐसा नहीं किया ।
साधको ! अपने सहसाधकोंके साथ मानसिक स्तरके प्रेमकी अपेक्षा आध्यात्मिक स्तरके प्रेमको चरितार्थ करनेका प्रयास करें ! उसे बुरा लगेगा, उसकी अपेक्षा अपथ्यके सेवनसे वह अस्वस्थ हो जाएगा; उसकी साधनामें बाधा आएगी; अतः उन्हें ऐसा करनेसे प्रेमपूर्वक रोकना, यह खरे अर्थोंमें प्रेम है । प्रीतिमें अर्थात निरपेक्ष प्रेममें मानसिक स्तरके प्रेमके लिए कोई स्थान नहीं होता, यह ध्यान रखें एवं अपने विवेकका उपयोग कर, उचित और अनुचितका विचार कर, विशुद्ध हेतुसे योग्य प्रकारसे अपने विचार व्यक्त करें !
सन्त सम्पूर्ण समाजसे निरपेक्ष प्रेम करते हैं; अतः वे सभीको उचित और अनुचितके विषयमें तटस्थ होकर मार्गदर्शन दे पाते हैं; इसलिए वे समाजमें पूजनीय होते हैं । किसीको बुरा लगेगा इसकी अपेक्षा, इससे उसका कल्याण होगा, यह भाव अधिक श्रेष्ठ होता है, इस दृष्टिकोणका सदैव ध्यान रखें ! माता अपनी सन्तानको इसी भावसे कोई बडी चूक होनेपर दण्डित करती हैं; इसीलिए हम उनका प्रथम गुरुके रूपमें आदर करते हैं ।
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