सुखं आत्यांतिकं यत् तत् बुद्धिग्राह्यं अतीद्रियं ।
यं लब्वा आत् चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत: ।।
अर्थ : जिस सुखको शरीरके अंगोंके माध्यमसे नहीं प्राप्त किया जा सकता है और उस सुखकी अनुभूति लेनेके पश्चात और उसकी बुद्धिसे कुछ सीमा तक प्रचीति लेनेपर अन्य किसी भी प्रकारके सुखको पानेकी इच्छा शेष नहीं रहती उसे ही आत्मानंद कहते हैं।
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