गुरुके साथ सदैव रखें द्वैत भाव


अद्वैतं भावयेन्नित्यं सर्वावस्थासु सर्वदा ।
कदाचिदपि नो कुर्यादद्वैतं गुरुसन्निधौ ।।

 – श्रीगुरु गीता
अर्थ : अद्वैतकी स्थिति सर्वकाल, सर्व परिस्थितिमें अनुभूत कर सकते हैं; परंतु श्रीगुरुके संदर्भमें कदापि ऐसा नहीं करना चाहिए अर्थात श्रीगुरुके प्रति कृतज्ञता एवं सेवाभाव सदैव होना चाहिए अर्थात द्वैत भावमें आकर श्रीगुरुकी सेवा करना चाहिए।



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