दशांशके त्यागसे धनका शुद्ध होना


न्यायोपार्जित वित्तस्य दशमांशेन धीमत: ।
कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरं प्रीत्येर्थमेव च ।

-स्कंदपुराण                                       

अर्थ : धर्मके मार्गसे अर्जित धन भी तभी शुद्ध होता है जब निस्वार्थ भावसे दशांशका त्याग, ईश्वरीय कार्य हेतु निवेदित किया जाये।



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