आधुनिक हिन्दुओंकी संस्कारभ्रष्टता


कुछ समय पूर्व एक वृद्ध कर्मकाण्डी सन्तका हमारे देहली आश्रममें पदार्पण हुआ। उनके आश्रममें प्रवासके मध्य एक साधकके यहां एक वैयक्तिक कार्यक्रम अंतर्गत भोजमें (लंच पार्टी) उन्हें भी हम ले गए क्योंकि उस साधक कुटुंबकी और पूज्य बाबाकी इच्छा थी। भोजका आयोजन एक खुले मैदानमें था। भोजसे आनेके पश्चात् मुझे उन संतने अपना आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, “मैंने देखा कि  भोजन सेवन करनेके पश्चात् किसीने भी हाथ नहीं धोए और वहीं रखे एक कागदसे (पेपर नैपकिन) सभीने अपने हाथ पोछ लिए।”  मैंने कहा “बाबा, यह देहली महानगर है, आपने तो भोजनके पश्चात् हाथमें पानी नहीं लेते हुए  देखा, यहांके हिन्दू तो इतने आधुनिक हो गए हैं कि वे दीर्घशंकाके (शौचके) पश्चात् भी पानी नहीं लेते और कागद उपयोग करनेमें बडप्पन समझते हैं, अब ‘आधुनिक बने हिन्दुओं’में शुचिता रही ही कहां !”
घरमें बाहरसे आकर उसी पाद्त्राणमें (चप्पलमें) घरमें घूमते हैं, लघुशंका(मूत्र त्याग) एवं दीर्घशंकाके पश्चात् पैर नहीं धोते हैं क्योंकि उनके शौचालय और स्नानगृह गीले हो जायेंगे ! अब तो उनकी भलाईके लिए आजके आधुनिक विज्ञानने ‘हैण्ड सेनीटाईजर’ भी उपलब्ध करवा दिया है, जिसमें स्वच्छता हेतु जलको स्पर्श करनेकी कोई आवश्यकता ही नहीं होती। धर्मशिक्षणका अभाव, शुचिता या पवित्रताके प्रति अज्ञानता, आलस्य एवं आधुनिक बननेकी प्रतिस्पर्धाने हिन्दुओंके संस्कारको भ्रष्ट कर, उसे असुरत्वकी ओर प्रवृत्त कर रही है।
यथार्थमें भोजन करनेके पश्चात्, लघुशंका एवं दीर्घशंकाके पश्चात् शरीरके अंगोंको जलसे शुद्धि करना आवश्यक होता है, इससे हमारे शारीरिक शुद्धिके साथ ही हमारे अन्दर पवित्रता निर्माण होती है जो हमें दैवी तत्त्वके निकट ले जाती है – तनुजा ठाकुर  (५.२.२०१५ )



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