सर्वज्ञ होनेके कारण श्रीगुरुका मेरे जीवनमें आगमनसे पूर्व साधना करवा कर लेना


guru sansmaranगुरु संस्मरण
सद्गुरुको मात्र स्थूल देह समझनेकी भूल न करें, वे एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी तत्त्वके प्रतिनिधि होते हैं ।  स्थूल रूपमें देहधारी गुरु अपनी इस विशेषताका परिचय, अपने शिष्यको उसकी पात्रता एवं श्रद्धानुसार अनुभूतियोंके माध्यमसे देते हैं । ख्रिस्ताब्द १९९७ में परम पूज्य गुरुदेवके प्रथम दर्शनके पश्चात् उन्होंने अनेक अनुभूतियां प्रदान कीं । यथार्थमें सद्गुरुद्वारा प्रदत्त अनुभूतियोंको वर्णन करना असंभव है, सन्त कबीर कहते हैं –
सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनाई ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाई ॥
अर्थात् जिस प्रकार हरिके गुणोंको वर्णन करना अत्यन्त दुर्लभ कार्य है, उसी प्रकार सद्गुरुद्वारा दी गयी स्थूल एवं सूक्ष्म अनुभूतियोंको शब्दोंमें व्यक्त करना असंभव है तथापि कुछ अनुभूतियां आपके समक्ष प्रस्तुत कर, सद्गुरुके भिन्न दिव्य गुणोंका वर्णन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनेका यह एक तुच्छसा प्रयास इस ग्रन्थके माध्यमसे करने जा रही हूं ।
यदि मेरे इस संस्मरणको पढकर आपकी गुरुके प्रति श्रद्धा एवं भाव बढनेमें सहायता हो या आपको भी अपने गुरुके ऐसे ही दिव्य गुणोंका महात्म्य समझमें आए तो समझुंगी कि मेरी यह सेवा मेरे श्रीगुरुके चरणों तक पहुंच गई !
धर्म-प्रसारकी सेवाके मध्यमें अन्य सम्प्रदायोंके कुछ गुरुभक्तोंसे मिलनेपर ऐसा भान हुआ कि कुछ गुरु अपने शिष्यको गुरु तत्त्व सम्बन्धी शास्त्र बतानेके स्थानपर अनुभूतियां देकर, उन अनुभूतियोंके माध्यमसे अध्यात्मशास्त्र एवं गुरु-तत्त्वकी विशेषता समझानेका कार्य करते हैं । आशा करती हूं इस ग्रन्थके लेखोंकी शृंखलाके माध्यमसे आपको भी अपने श्रीगुरुके दिव्य संस्मरण हो जाएंगे और आप भी गुरुभावके सागरमें डूब जाएंगे ।
१. सद्गुरु देह नहीं, अपितु एक सर्वज्ञ ईश्वरीय तत्त्व होते हैं
सर्वज्ञ होनेके कारण श्रीगुरुद्वारा, हमारे जीवनमें आगमनसे पूर्व साधना करवा कर लेना

मेरे सर्वज्ञ गुरुने मेरे जीवनमें प्रवेश करनेसे पूर्व ही ‘मेरी साधना कैसे आरम्भ कराई ?’ यहांसे मैं अपने गुरु संस्मरणका शुभारम्भ करती हूं –
१. अ. श्रीगुरुने दिए बाल्याकालसे ही आध्यात्मिक माता-पिता एवं साधना हेतु पूरक वातावरण देकर आरम्भ करायी मेरी साधना : बाल्यकालसे ही हमारे घरका वातावरण आध्यात्मिक था; अतः माता-पिताके माध्यमसे मेरी साधना होती रही । घरका वातावरण आश्रम-समान था अर्थात् आने-जानेवाले अतिथियोंका तांता लगा रहता था एवं सभी अतिथियोंका प्रेम-पूर्वक आदर सत्कार किया जाता था ।
घरमें सारे व्रत-त्यौहार अत्यधिक विधि-विधान पूर्वक किए जाते थे, जब घरके सभी सदस्य बैठते थे तो आध्यात्मिक वार्तालाप ही अधिकतर होता था, जिसमें धर्मग्रन्थोंके दृष्टिकोण एवं प्रेरक कथाएं, माता-पिता बताया करते थे; फलस्वरूप प्रसारमें भिन्न स्थानोंपर साधकोंके घरोंमें या आश्रममें रहनेमें मुझे कभी कोई  कठिनाई नहीं हुई । माता-पिता और दादी-मांके आध्यात्मिक एवं संस्कारी होनेके  कारण अध्यात्मके बहुतसे दृष्टिकोण उनसे सीखे या यूं कहूं, मेरे श्रीगुरुने उनके माध्यमसे सिखाए । हमारे माता-पिताके सम्पर्कमें आनेवाले व्यक्ति कुछ क्षणोंमें ही उनके हो जाते थे, उनसे मैंने ‘प्रेमभाव’का गुण सीखा । त्यागकी वृत्ति माता-पितामें कूट-कूट कर भरी थी; अतः त्यागकी वृत्ति भी सहज ही आत्मसात् हो गई ।
१. आ. माता-पिताके पश्चात्, मेरा छोटा भाई बना मेरा अगला मार्गदर्शक : 
मैं बाल्यकालसे ही माता-पिताद्वारा सिखाए गए श्लोकोंका पठन एवं नामजप किया करती थी । ख्रिस्ताब्द १९९० से ही ईश्वर, धर्म और अध्यात्मको जानने और समझनेकी तीव्र तडप निर्माण होने लगी । मेरी विधिवत साधना तब आरम्भ हुई, जब जुलाई १९९४ में छोटे भाईने नामजप, ध्यान और गुरु चरणोंके मानस पाद्य-पूजनके सम्बन्धमें बताया था । तबसे मैं नियमित रूपसे सब कुछ स्वयंप्रेरित होकर करती रही । दो वर्षोंमें उसकी बताई साधनासे मुझे अनेक व्यावहारिक और आध्यात्मिक अनुभूतियां हुई, इस कारण मन-ही-मन, मैं उसे गुरु-रूपमें देखने लगी ।
ख्रिस्ताब्द १९९६ में जब मेरी उससे मुम्बईमें भेट हुई, तब मैंने कृतज्ञताके भावसे उसके चरण-स्पर्श भी किए और उससे कहा – “अब मुझे पूर्वकी भांति आनन्द नहीं मिलता, इसके लिए मैं क्या करूं ? मैंने तुम्हें अपना गुरु माना है; अतः साधनामें मेरा आगेका मार्गदर्शन करो ।”  छोटे भाईने बडी ही सहजतासे कहा – “दीदी, मेरा और तुम्हारा योगमार्ग भिन्न है, मैं हठयोगी हूं और तुम भक्तिमार्गी हो, मैं तुम्हारा गुरु नहीं । तुम्हारे गुरु कोई और हैं ।” इतना कहकर वह चला गया । (मेरा यह छोटा भाई, लोगोंको योग सिखाता है और ईश्वर कृपासे उसने अनेक साधकोंको साधनाके पथपर अग्रसर भी किए हैं ।) उसकी यह बात सुन, जैसे ‘मेरे पैरोंके नीचेकी धरती ही खिसक गई हो’, मैं यह सब सुनकर अत्यधिक विचलित हो गई और सोचने लगी कि इस मायानगरीमें (मुम्बई) सद्गुरुको कहां ढूंढूं ? मेरा अन्तर्मन सद्गुरुके लिए तडपने लगा, समझमें नहीं आ रहा था कि अपनी व्यथा किसे बताऊं ? बहुत रोनेकी इच्छा हो रही थी ।
 २. स्थूल-रूपमें श्रीगुरुका मेरे जीवनमें प्रवेशसे पूर्व, हुई विचारप्रक्रिया एवं प्रार्थनाका परिणाम 
स्वामी रामकृष्ण परमहंससे किए गए आर्ततासे निवेदनके कारण हुआ सद्गुरुसे साक्षात्कार
ख्रिस्ताब्द १९९२ में इसी छोटे भाईने कुछ आध्यात्मिक ग्रन्थ पढने हेतु दिए थे, बाल्यकालसे ही मेरी ज्ञान प्राप्तिमें विशेष रुचि होनेके कारण, ग्रन्थ पठनमें मेरी विशेष अभिरुचि थी  । उसके दिए सारे ग्रन्थोंका मैंने अत्यधिक सूक्ष्मतासे अभ्यास किया था; उसमें कुछ ग्रन्थ स्वामी रामकृष्ण परमहंसजीकी सीखके सम्बन्धमें भी थे । मैंने उन ग्रन्थोंका भी सूक्ष्मतासे अभ्यास किया था । मेरे भाईद्वारा मेरे गुरुको ढूंढनेवाली घटनाके तीन-चार दिनोंके उपरान्त, एक दिन मेरा ध्यान एक ग्रन्थकी ओर गया, जिसके  मुखपृष्ठपर स्वामी रामकृष्ण परमहंसजीका चित्र था । मैंने उस ग्रन्थको हाथमें लेकर स्वामीजीको अपनी सारी व्यथा सुनाई और फूट-फूट कर गुरुको पानेकी इच्छासे रोने लगी । मुझे लगा जैसे यदि कुछ दिवसोंमें मुझे सद्गुरु न मिले तो निश्चित ही मेरे प्राण निकल जाएंगे ।
मैंने उनके चित्रको देखकर कहा “आप कहते हैं कि सन्तका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता, सन्तका सूक्ष्म तत्त्व, सदैव इस ब्रह्माण्डमें व्याप्त रहते हैं तो अब आप ही मुझे मेरे सद्गुरुसे साक्षात्कार कराएं और मुझे आप जैसे परमहंस स्तरके सद्गुरु चाहिए, जो मुझे निर्विकल्प समाधिकी अनुभूति दे सकें”, इतना कहकर मैं रोने लगी और बहुत देर तक रोती रही ।
इस घटनाको दो सप्ताह भी नहीं हुए होंगे कि एक दिवस जब मैं अपने कार्यालयसे अपने एक निकट सम्बन्धी संग लौट रही थी, तब अकस्मात् वर्षा होने लगी । हम वर्षासे छुपनेके लिए मार्ग  पारकर एक देवालयमें (मंदिरमें) चले गए, वहां मैंने एक फलक(बैनर) देखा, वह ‘सनातन संस्था’का फलक था, जिसमें उस देवालयमें होनेवाले सत्संगकी जानकारी थी; परन्तु उस फलकमें जो लिखा था, उसने मुझे अत्यधिक आकृष्ट किया और वह था – ‘अच्छा साधक कैसे बनें ? एवं ‘शंका समाधान’ । मेरे मनमें अनेक शंकाएं थीं और एक अच्छा साधक भी बनना चाहती थी; अतः मैंने उस सत्संगमें जानेका निश्चय किया और इस प्रकार उस सत्संगके माध्यमसे मुझे कुछ माह उपरान्त मुझे, मेरे श्रीगुरुका साक्षात्कार हुआ ।
आज भी मुझे यही लगता है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंसजीने मेरी प्रार्थना सुनकर, मुझे मेरे श्रीगुरुसे साक्षात्कार करवाया और सत्य भी यही है । सन्तके दो रूप होते हैं । एक है उनका सगुण-रूप अर्थात् उनकी देहधारी स्वरूप एवं दूसरा, उनका निर्गुण-रूप अर्थात् उनके अन्दरका ईश्वरीय तत्त्व, जो इस ब्रह्माण्डमें सदा व्याप्त रहता है । मेरा मार्गदर्शन स्वामीजीके निर्गुण तत्त्वने किया, ऐसा मेरा दृढ विश्वास है एवं इसमें कोई दो मत  नहीं । – पूज्या तनुजा ठाकुर ( आगामी ग्रन्थ ‘गुरु संस्मरण’से उद्धृत)



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