रेडियोके माध्यमसे सिखाया वर्तमानमें रहना


सगुण गुरुके निर्गुण निराले माध्यम
इस लेखकी विभिन्न कडियोंमें हमारे श्रीगुरुने किन भिन्न-भिन्न माध्यमोंसे मुझे अध्यात्मकी शिक्षा दी, वह प्रस्तुत करनेका प्रयास करना चाहुंगी, इससे यह समझमें आएगा कि गुरु अपने शिष्यको कहीं भी और किसी भी माध्यमसे ज्ञान देनेमें सक्षम होते हैं और इसलिए गुरुको सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान तत्त्वके रूपमें शास्त्रोंमें उल्लेख किया गया है  |

मुझे बचपनसे ही नियोजनबद्ध पद्धतिसे रहना अच्छा लगता है | अक्टूबर १९९७ की बात है | मुझे परम पूज्य गुरुदेवके मार्गदर्शनमें साधना करते हुए पांच महीने ही हुए थे | उस समय, मैं मुंबईमें रहती थी, एक दिन मैं भविष्य हेतु पैसे संजोकर रखनेके लिए कुछ योजना बना रही थी | अगले दिन प्रातःकाल  छह बजे भक्तिगीत हेतु FM रेडियो स्टेशन लगानेके लिए रेडियो लगाने जा रही थी कि अचानक रेडियो FM के स्थानपर ‘विविध भारती’ लग गया | वहांसे ‘आजका विचार’ इस कार्यक्रम अंतर्गत कुछ आध्यात्मिक विचार आ रहे थे | पता नहीं कैसे, मैंने रेडियोको उसी स्टेशनपर लगा कर छोड दिया | और उस दिनके कार्यक्रमसे प्रसारित विचारने मेरे जीवनकी दिशा परिवर्तित कर दी | ऐसा लगा जैसे मेरे श्रीगुरुने ही मुझे वह दृष्टिकोण देनेके लिए उस दिन वह विचार बता रहे हों | उस दिन रेडियोसे ‘आजका विचार’ अंतर्गत एक छोटी किन्तु प्रेरक कथा बताई गयी जो कुछ इस प्रकार है –
एक सेठके पास अगाध धन था; परंतु तब भी वह सदैव चिंतित रहता था कि मेरे सात पीढीयां तो मेरेद्वारा अर्जित धन दोनों हाथ लुटाये तो भी उनकर निर्वाह ठाठसे हो जायेगा; परन्तु उसके आगे क्या ? वह इसी चिंतामें व्यग्र रहता था | एक दिन उस गांवमें एक सिद्ध पुरुष पहुंचे | संतने गांवमें अपना उपदेश दिया तो सेठ भी उसके पास पहुंच गया और जब सेठको भान हो गया कि संत अत्यंत उच्च कोटिके सिद्ध पुरुष हैं तो सत्संग समाप्त होनेपर जब सब लोग चले गए, तब भी वह बैठा रहा और संतके पूछनेपर उसने अपनी चिंता बताई | संत मुस्कुराते हुए बोले, ” इस समस्याका तो बडा ही सरल समाधान है” और कहा कि गांवके बाहर जो एक बुढिया रहती है कल सुबह एक समयका कच्चा भोजन लेकर चले जाना, वह तुम्हारे समस्याका सदाके लिए हल बता देगी, यह सुनकर सेठ अत्यंत प्रसन्न हो गया | संतकी वह बात सुन उसे रात भर नींद नहीं आई और सुबह तडके उठकर नहा-धोकर गांवके बाहर रह रही उस वृद्ध स्त्रीकी कुटियाकी ओर गया | कुटिया टूटी- फूटी थी और यह देख उसे बहुत दुःख हुआ, उसने सोचा यदि पता होता कि बुढिया इतनी दरिद्र है तो वह अधिक अनाज लेकर आ जाता | जैसे ही सेठ बुढियाके घरके बाहर चौखटपर पहुंचा तो उसने कहा “कल जो संत आये थे उन्होंने ही तुम्हें यहां भेजा है न”, तो सेठने हामी भरी और बुढियाके लिए लाया हुआ  कच्चा भोजन देनेके लिए हाथ बढाया, बुढिया बोली ” मेरे लिए जो दाल-चावल लाये हो वह लेकर जाओ, आजके लिए मेरे पास भोजन है और मुझे आज इसकी आवशयकता नहीं है”, सेठने बडे ही आश्चर्यसे कहा “तो कलके लिए ले लो मां”, बुढिया बोली, “अरे मुर्ख, जिस भगवानने आज भोजन दिया है वह कल नहीं देगा क्या ! मैं कलके लिए कुछ भी एकत्रित कर नहीं रखती, मैं आजमें जीती हूं ” | सेठको बोध हो गया, उसे समझते देर नहीं लगी कि बुढिया कोई साधारण स्त्री नहीं और वे संत भी कोई दिव्य पुरुष ही हैं ! बुढियाको प्रणाम कर, वह उस सिद्ध पुरुषको ढूंढने निकल पडा, संत कुछ ही दूरमें खडे मुस्कुरा रहे थे, सेठ संतको देखते ही उनके चरणोंमें गिर पडा, वह समझ गया कि यह सब उनकी ही लीला थी, कहां इतने धन होते हुए भी वह सात पीढीयोंके आगेकी चिंता करता था और कहां कलके भोजनकी भी न चिंता करनेवाली वह बुढिया ! और वह सेठ सब कुछ त्याग कर संतके संग निकल पडा |
यह कथा सुननेके पश्चात् मुझे भी समझमें आ गया कि मेरे श्रीगुरुने आज मुझे भजनके स्थानपर यह कथा क्यों सुनाई और उस दिनसे भविष्य और उसके नियोजनकी चिंता छोड, आनंदपूर्वक वर्तमानमें रहने लगी | और संतोषी प्रवृत्ति होनेके कारण, ख्रिस्ताब्द १९९८  से आज तक पूर्णकालिक साधक होनेके पश्चात् भी ईश्वरने कभी भी मुझे रत्ती मात्रका न अभाव होने दिया है और न ही कोई कष्ट ! जब जिस भी वस्तुकी आवश्यकता हुई, उसे उन्होंने अपने किसी माध्यमसे मुझे उपलब्ध करवाकर दे दिया | – तनुजा ठाकुर



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