सगुण गुरुके निर्गुण निराले माध्यम
ख्रिस्ताब्द १९९९ में मैं झारखण्डके धनबाद जनपदमें धर्म-प्रसारकी सेवा कर रही थी, उस समय वहांपर नगरके एक छोरसे दूसरे छोर तक जाने लिए सहजतासे हाथ-रिक्शाके अतिरिक्त दूसरा कोई परिवहनका साधन उपलब्ध नहीं था । हाथ रिक्शासे एक स्थानसे दूसरे स्थान जानेमें समयका अधिक व्यय तो होता ही था, धनका व्यय भी होता था । वैसे तो चार पहिया वाहन जैसे ‘जीप’ एक-एक घंटेपर चलती थीं; परन्तु नगरके भीतर नहीं चलती थीं और धनबाद से २० से २५ किलोमीटरकी दूरीपर जो छोटे- छोटे कस्बे या तहसील थे, उसीके मध्य चलती थीं और वे भी सदैव ठसाठस भरी रहती थीं; अतः उसका उपयोग करना भी अति कठिन ही होता था ।
मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरुको, मेरी इस दु:स्थितिका भान हो गया था और उन्होंने मेरे लिए गोवासे दो पहिया वाहन (स्कूटी) भिजवा दिया । मेरे लिए समस्या यह थी कि मुझे साईकिल चलानी नहीं आती थी, ऐसेमें स्कूटी चलाना और सीखना, मेरे लिए एक समस्या बन गयी थी । उस समय मैं कुछ बालसंस्कार वर्ग लिया करती थी और मुझसे कुछ बडे प्यारे बाल एवं युवा साधक जुड गए थे जो बडी लगनके साथ छुट्टियोंमें प्रसारकी सेवामें मेरी सहायता करते थे । जिन साधकके घर मैं उस समय रहती थी, उन्हींके घर, स्कूटी भी रख दी थी । वह ‘होंडा’की स्कूटी थी और अत्यधिक भारी थी । मैं जहां रहती थी वह एक छोटी-सी कॉलोनी थी और वहां १० बंगले थे जिसमें अधिकतर सभीमें नगरके प्रतिष्ठित एवं अत्यंत धनाड्य व्यापारी वर्ग रहते थे और उनके बच्चे बाल-संस्कार वर्गमें आया करते थे । मैं प्रतिदिन उस स्कूटीको देखती और सोचती कि इसे कैसे और कबसे चला पाऊंगी । एक दिवस एक बाल साधक, जिनके घरमें रहती थी उसने कहा, “दीदी, ऐसे प्रतिदिन स्कूटीको देखते रहनेसे आप थोडे ही न इसे चलाना सीख पाएंगी, आपको इसके लिए प्रयास करना होगा और आप चाहें तो मैं आपको इसे चलाना सिखा सकता हूं मेरे पास जो दो पहिया वाहन है वह अत्यधिक हल्का है आप पहले उसमें चलाना और अपना समतोल (बैलेन्स) बनाना सीख लें, उसके पश्चात, इसे चलाएं । ” मुझे उसका सुझाव योग्य लगा । इस प्रकार मेरी वानर सेनाने स्कूटी सिखानेका अभियान आरंभ कर दिया । वैसे तो सारे बाल और युवा साधक आठवींसे बारहवीं कक्षा तकके ही थे; परंतु सभीके पास स्कूटी थी और वे उसे चलाना जानते थे और उसमें एक बालसाधक जो आठवीं कक्षामें पढता था वह मुझे अपनी दो पहिया वाहनसे मुझे स्कूटी सिखानेके लिए प्रयास करने लगा और उसके पीछे मेरा उत्साहवर्धन हेतु होती थी, मेरी पूरी वानरसेनाकी टोली ! मैंने साईकिल तो चलायी थी नहीं ;अतः मैं जब भी स्पीड बढाती तो मुझे डर लगता और मैं अपना समतोल बनानेके लिए नीचे पैर रख देती । सीखनेके क्रममें मैंने कई बार तो उनकी गाडी गिराई भी और दो-तीन बार, वह बालसाधक भी मुझे बचाने हेतु गिरा; किन्तु गुरुकृपाके कारण कभी किसीको या मुझे खरोंच तक नहीं आई । प्रतिदिन संध्या समय, हम आठ दिवस तक हम इसीप्रकार अभ्यास करते रहे ।
आठवें दिवस एक पुरुष, जिन्हें साधक तो नहीं कह सकते; परंतु वे हमारे शुभचिंतक थे और हमारे साधिकाके पति थे, वे मुझे अपनी छोटी बहन समान अत्यधिक स्नेह करते थे और उनकी पत्नी साधनारत थीं, इसीलिए उनके घर आना-जाना लगा रहता था और वे कहीं भी हमारी टोलीको अपने चार पहियेवाले वाहनसे प्रसार हेतु ले जाने और लानेकी सेवा सहर्ष किया करते थे । एक दिवस जब मैं स्कूटी चलानेका ‘निरर्थक प्रयास’ कर रही थी तो वे प्रतिदिन समान संध्या समय सैर करने निकले, वे कहने लगे “तनुजा दीदी, मैं आपको पिछले आठ दिनसे देख रहा हूं और मुझे लगता है ऐसे तो आप स्कूटी चलाना कभी भी नहीं सीख पाएंगी, मैं आपको स्कूटी चलाना सिखाऊंगा, कल गोल्फ ग्राउंड (एक बडी सपाट मैदान थी ) वहां सवेरेमें इस स्कूटीको लेकर आयें, मैं अपनी कारसे आऊंगा और आपको स्कूटी चलाना सिखा दूंगा, आप एक दिनमें ही स्कूटी चलाना सीख जाएंगी” । मुझे उनकी बात अच्छी लगी । मैं और वह बालसाधक उस मैदानमें अगले दिवस, प्रातःकाल, स्कूटी लेकर पहुंचे । वे समय और अनुशासनके बडे पक्के थे; अतः ठीक समयपर पहुंच गए थे । मेरी उनसे साधना, अध्यात्म और अपने श्रीगुरुके बारे अनेक बार चर्चा हो चुकी थी । मैंने उनसे कहा “अब बताएं एक दिनमें आप मुझे कैसे स्कूटी चलाना सिखायेंगे और क्या करना होगा मुझे” ? उन्होंने मेरी ओर देखा और कहने लगे “आप बार-बार अपने श्रीगुरुके विषयमें बताती रहती हैं, यदि आपकी अपने गुरुके प्रति सचमें अंशमात्र भी श्रद्धा है तो आप इसी समय स्कूटीसे इस मैदानके मात्र चार चक्कर लगाकर दिखाएं ।” मुझे ये सुन कर थोडा क्रोध आया कि आए तो थे मुझे स्कूटी सिखाने और मेरी श्रद्धापर उंगली उठाने लगे हैं । उन्होंने पुनः जैसे ललकारते हुए कहा, “बोलने और करनेमें अन्तर होता है, दीदी, अन्यथा आप मेरी बातको तुरंत स्वीकार कर लेतीं ।” मैंने उनकी ओर देखा, स्कूटीपर बैठी और पता नहीं क्या हो गया मुझे, मैंने चार चक्कर बिना रुके, बिना झिझके और बिना गिरे लगाकर उनके सामने अपनी स्कूटी खडी कर दी । मैंने कहा “पुनः इस प्रकारकी बातें कभी न कीजिएगा और अब मुझे स्कूटी सिखाएं जिसके लिए हम यहां आए हैं ।” वे रजोगुणी तो थे ही, ठहाका लगाकर हंसे और कहने लगे “अब क्या सिखाऊंगा, आपके गुरुने तो आपको सिखा ही दिया और मैं आपकी गुरुभक्तिको नमन करता हूं” ! वे आगे बोले, “मैं आपको पिछले एक सप्ताहसे देख रहा था कि आप स्कूटी तो चला ले रही थीं, मात्र थोडी आत्मविश्वासकी कमी थी, इसलिए मैंने मन ही मन यह योजना बनाई और देखिए मेरी योजना सफल हो गयी और आप मेरे मापदण्डपर भी खरी उतरीं” । कुछ क्षणके लिए तो मुझे समझमें नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करूं या उनसे लडाई करूं; क्योंकि उन्होंने मेरे श्रीगुरुका आधार लेकर मुझे सिखाया भी और बुद्धू भी बनाया । मैं कुछ क्षण शांत थी, वे मुस्कुराने लगे, बोलें, “स्कूटी चलाकर वापिस घर चलिए, आपको चलना आ ही गया है । ” और वह नटखट बालसाधक भी झटसे उनकी गाडीमें बैठ गया, उसे अत्यधिक आनन्द हुआ कि मैं स्कूटी चलाना सीख गयी थी । वे महोदय, मेरी स्कूटीके पीछे दस किलोमीटरकी गतिसे अपनी गाडी चला रहे थे और मैं पहली बार तीन किलोमीटर अकेले ही स्कूटी चलाकर साधकके घर आई और मुझे उनके प्रति, उस बालसाधकके प्रति और अपने श्रीगुरुके प्रति अत्यधिक कृतज्ञता हुई । धर्मप्रसारकी सेवामें स्कूटी चलाना आता था; अतः मुझे इस कारण अत्यधिक लाभ हुआ और इस हेतु आज भी मैं, मेरे श्रीगुरुके, उन दोनों माध्यमोंके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती रहती हूं । – तनुजा ठाकुर
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