श्रीगुरुने पूरे गांवको ही बना दिया साधक
ख्रिस्ताब्द २००२ में एक दिवस मराठी साप्ताहिक ‘सनातन प्रभात’में ‘साधक कुटुम्ब’, इस स्तम्भके अन्तर्गत साधकका पूरा कुटुम्ब किस प्रकार साधना कर रहा है, उसकी जानकारी पढ रही थी । मैं अपने कुटुम्बमें अकेली ही साधनारत थी । मैं उस स्तम्भको देख सोचने लगी, मैं अत्यधिक अभागी हूं, मेरे कुटुम्बमें कोई साधना नहीं करता । जून २००८ में मैं झारखण्ड स्थित अपने पैतृक गांव आई और वहां दो वर्ष रही । जनवरी २०१० अर्थात् डेढ वर्षके पश्चात् ‘उपसाना’के माध्यमसे वहींसे ईश्वर आज्ञा अनुरूप स्वतन्त्र रूपसे गुरुकार्य आरम्भ किया और कुछ लोगोंको छोड, मेरे पूरे गांवने साधना आरम्भ कर दी ! नवम्बर २०११ में एक साधक गोवासे आए वे कहने लगे “दीदी ! मुझे तो इस गांवमें रामराज्यकी झलकियां दिखने लगीं हैं ।” उस दिवस मुझे लगा कि मेरे सर्वज्ञ सद्गुरु मेरे मनकी सूक्ष्मतम इच्छाको भी जानते हैं ।
मेरे बिना बताये निकट सम्बन्धीके विवाहकी निमन्त्रण-पत्रिकाकी सात्त्विक संरचना श्रीगुरुने सूक्ष्मसे करवाई एवं उसमें दिव्य सुगन्ध देकर उसके सात्त्विकताकी पुष्टि
ख्रिस्ताब्द २००७ में मेरे निकटतम सम्बन्धीका विवाह नियोजित था; परन्तु वे हमारे श्रीगुरुकी शरणमें साधना नहीं करते हैं । हमारे श्रीगुरुने विवाह निमन्त्रण-पत्रिकाकी सात्त्विक प्रकारसे संरचना करना भी हमें सिखाया था; अतः साधक उसी प्रकारके वैवाहिक निमन्त्रण-पत्रिका छपवाते हैं । मेरी भी इच्छा थी कि ऐसा हो; परन्तु मुझे ज्ञात था यदि मैं उन्हें कहूंगी भी तो वे मानेंगे नहीं; अतः मैंने मौन रहना ही उचित समझा । जब विवाह निमन्त्रण-पत्रिका कुछ सम्बन्धियोंको बांटने हेतु मेरे हाथमें दिया गया तो मैंने देखा कि उसका मुखपृष्ठ अत्यन्त पारम्परिक एवं सात्त्विक था । मैंने प्रथम निमन्त्रण-पत्रिका अपने श्रीगुरुके आशीर्वाद हेतु गोवाके रामनाथी आश्रममें भेज दिया । जब दो मास पश्चात् गोवा आश्रम पहुंची तो एक साधकने बताया कि श्रीगुरु उसे सबको देखनेके लिए रखवाया था और उससे दैवी सुगन्ध आ रही थी; अतः उसे आध्यात्मिक संग्रहालयमें संग्रहित कर रखनेके लिए कहा था । मेरे अन्तर्यामी श्रीगुरुकी यह लीला देख मेरे नेत्रोंमें अश्रु आ गए । -तनुजा ठाकुर
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