अ. स्नान एवं वास्तु-शुद्धिके पश्चात् नित्य पूजा अवश्य करें। चाहे आप किसी भी योगमार्गसे साधना कर रहे हों, किन्तु जिस ईश्वरने इस ब्रह्माण्डका सृजन कर, उसे सुचारू रूपसे चलाने हेतु देवताओंको कार्यभार सौंपा है, उनके प्रति अपनी दिनचर्याके मध्य कृतज्ञता व्यक्त करना न भूलें। पंचोपचारसे अपने पूजाघरमें नित्य पूजन कर, देवताओंके प्रति अपनी कृतज्ञता अवश्य व्यक्त करें । इस हेतु देवताके छायाचित्र या मूर्तिको स्वच्छ कर, उन्हें धूप, दीप गन्ध, पुष्प एवं नैवेद्य दिखाकर आरती गाएं। आरती एक, तीन या पांच देवताओंकी गा सकते हैं। उस आरतीमें घरके सभी सदस्य सम्मिलित हों, यह ध्यान दें। भावपूर्वक की गयी आरतीसे देवताओंका हमारे घरपर सूक्ष्म आगमन होता है एवं हमारी वास्तुकी शुद्धि होती है। आरतीसे उपस्थित सदस्योंके ऊपर सम्पूर्ण दिवस कवच निर्माण रहता है एवं व्यावहारिक व अध्यात्मिक कष्ट न्यून होकर, मन प्रसन्न एवं आनंदी रहता है।
आ. अपने पूजाघरको स्वच्छ एवं सात्त्विक रखें। उसे कागद या प्लास्टिकके फूल-मालाओंसे या छोटे रंगीन बल्बसे न सजाएं और न ही मोमबत्ती जलाएं क्योंकि इससे पूजाघरकी सात्त्विकता नष्ट होती है। अपने पूजाघरमें भूलसे भी अपने पितरोंके चित्र लगाकर न रखें, वह देवघर है, उसमें मात्र अपने गुरु एवं देवताओंके छायाचित्रको ही स्थान दें । उसमें बहुत पुराने, कटे-छटे छायाचित्र एवं टूटी-फूटी मूर्तियां या फाइबर, कांच या मिट्टीकी मूर्तियां रखकर पूजा न करें । मिट्टीकी मूर्तिमें देवत्व हेतु उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी पडती है तथा उसमें नियमित विधि-विधानपूर्वक पूजन न होनेपर वह देवत्वहीन हो जाती है | पूजाघरमें देवताओंकी संख्या अधिकसे अधिक आठ हो यह ध्यान दें – तनुजा ठाकुर (क्रमश:)
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