अ. सात्त्विक व्यक्ति उचित एवं आवश्यकता अनुसार आहार लेता है। राजसिक व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन तब तक लेता है, जब तक पेट भर न जाये और तामसिक व्यक्तिको अपनी जिह्वापर नियंत्रण नहीं होता है; अतः वे आवश्यकतासे अधिक भोजन करता है । इस शास्त्रवचन अनुसार अपनी प्रवृत्तिकी समीक्षा करें एवं सात्त्विक आचरण करना आरम्भ करें।
आ. पाश्चात्योंका भोजन जैसे ब्रेड, पिज्जा, मेगी, पास्ता, शीतपेय (कोल्ड ड्रिंक्स) इत्यादि एवं मद्य, मांसहार, बासी, अत्यधिक ठण्डा या गर्म, अत्यधिक मसालेदार, डिब्बाबंद, भोजनालयका (होटलका) आहार तामसिक होता है, खट्टा (आचार), तीखा, तला हुआ, चटपटा, विवाह आदि प्रीती भोजके कार्यक्रमोंमें परोसा गया या साधनाहीन किन्तु आज्ञाकारी सेवकद्वारा बनाया हुआ भोजन राजसिक होता है एवं महाप्रसादमें अर्पित किया हुआ भोजन, ताजा एवं शाकाहारी भोजन, साधकद्वारा बनाया हुआ भोजन सात्त्विक होता है । हम जैसा भोजन करते हैं हमारी मनकी प्रवृत्तियां वैसी ही बनती हैं; अतः सात्त्विक आहारका सेवन कर अपने मानसिक स्वास्थ्यकी रक्षा करें – तनुजा ठाकुर (क्रमश:)
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