सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – १५)


अ. वर्तमान समयमें साधना एवं धर्माचरणके अभावमें अधिकांश लोगोंको सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, ऐसेमें उनके जूठन ग्रहणसे (किसीका छोडा हुआ भोज्य पदार्थ) अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होनेकी आशंका रहती है । हाथोंके पोरोंसे सूक्ष्म शक्ति प्रवाहित होती है, यदि किसीको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट हो तो उसकेद्वारा ग्रहण किए हुए भोजनसे, जो हाथोंसे निकलनेवाली अनिष्ट स्पन्दनोंसे भारित रहती है, उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए । एक सामान्य व्यक्तिको यह समझमें नहीं आता है कि किसे अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, किसे नहीं; अतः सामान्यत: हिन्दू धर्ममें जूठनको तामसिक आहार कहा गया है  ।
आजकल जन्मदिनपर पाश्चात्यों समान मूढ अनुकरणप्रिय आधुनिक हिन्दू सभीको एक-दूसरेका जूठा केक खिलाकर, जिस प्रेमको बांटते हैं, वह वस्तुत: कालीशक्तिसे भारित होता है । उसीप्रकार अनेक लोगोंको विशेषकर देहली, पंजाबके लोग जो अधिकांशत: मुख्य आहारके रूपमें रोटी खाते हैं, वे दोनों हाथोंसे खाते हैं और वे उसी जूठे हाथसे दाल या तरकारी (सब्जी) निकालते हैं एवं बच जानेपर उस जूठनको अपनी प्रशीतकमें (फ्रिजमें) रख देते हैं तथा आवश्यकता पडनेपर अतिथियोंको भी खिलाते हैं, जो कि अनुचित है । भोजन एक ही हाथसे करना चाहिए एवं एक हाथको स्वच्छ रखना चाहिए और यदि यह नहीं सम्भव हो तो किसीको भोजन परोसकर खिलाना चाहिए ।
हमारे यहां भण्डारेमें या प्रीतिभोजमें (विवाहादि कार्यक्रममें) सभीको भोजन परोसकर खिलानेकी सात्त्विक एवं संस्कारी प्रथा रही है और ‘बुफे’की अंग्रेजोंकी प्रथा तामसिक है ! पूर्वकालमें घरकी माता या बहन सबको परोसकर खिलाती थीं एवं स्वयं उसके पश्चात खाती थीं; आजके कालमें यह अनेक बार सम्भव नहीं होता, ऐसेमें दाहिने हाथसे भोजन करें एवं बाएं हाथसे भोजन निकालें । ध्यान रखें, अपनेसे वयोवृद्ध, आयुर्वृद्ध, ज्ञानवृद्धको जूठन खिलाना पाप है; अतः भोजनके इस आचारधर्मका पालन करें एवं पापकर्मसे बचें ।

आ. हमारे पास विदेशमें रह रहे अनेक हिन्दू आश्रममें कुछ दिवस आकर रहते हैं वे भोजनके पश्चात् कागदसे हाथ पोंछ लेते हैं । पहले मैं यह कागद नहीं रखती थी तो वे कागदकी मांग करते थे अतः अब मैं उनके समक्ष कागद(पेपर नैपकिन) रख देती हूं एवं जब वे आश्रममें कुछ दिवस रहनेपर सहज हो जाते हैं तब उन्हें भोजन पश्चात् हाथ धोना सिखाती हूं ! भोजन करनेके पश्चात् हाथ धोना एवं कुल्ला करना यह सामान्यसा संस्कार भी आज अनेक हिन्दू पाश्चात्योंके अनुकरण करनेके क्रममें भूल गए हैं इससे अधिक धर्मकी कितनी ग्लानि हो सकती है, किंचित सोचें ।
वैसे ही कुछ लोग आजकल ‘हैण्ड सनीटीजेर’का उपयोग करते हैं और उसके पश्चात् भोजन करने लगते हैं और मुझसे कहते हैं इससे हाथ जीवाणुरहित हो जाता है । ऐसे सभी पढे-लिखे आधुनिक हिन्दुओंको विनम्रतासे बताना चाहेंगे कि इससे हाथ जीवाणुरहित हो जाता ‘होगा’ ( होगा इसलिए लिखा है क्योंकि कुछ समय पश्चात् आधुनिक वैज्ञानिक, इससे भी कैसे स्वास्थ्यको हानि पहुंचती है वह शोध कर बताएंगे ) किन्तु  रासायनिक द्रव्य होनेके कारण वह तमोगुणसे भारित अवश्य ही हो जाता है और वही तमोगुण आप भोजनके माध्यमसे अपने शरीरको पहुंचाते हैं एवं कुछ समय पश्चात् अपने कष्टोंका रोना रोते हैं – तनुजा ठाकुर (क्रमश:) (२८.६.२०१७)



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