नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥
अर्थ : हे रघुपति ! मैं सत्य कहता हूं यद्यपि आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) तथापि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है, हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिए ।
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