धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
अर्थ : धर्मके दस लक्षण हैं – धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना ।
भावार्थ : जो धार्मिक या साधक बनना चाहते हैं, उन्होंने धर्मके इन दस लक्षणोंको आत्मसात करना चाहिए । इन्हें अच्छेसे स्मरणकर, इसके विपरीत अवगुणोंको दूर करनेका प्रयास करना चाहिए । जैसे उतावलापन, प्रतिशोध लेनेकी वृत्ति होना, विषय-वासनाओंके प्रति आसक्त होना, चोरी करना (भ्रष्टाचार करना, यह भी चोरी करना ही है), इन्द्रियोंके वशमें होना अर्थात जो पंच ज्ञानेन्द्रियोंको एवं कर्मेन्द्रियोंको अच्छा लगे, वह करना, बुद्धि भ्रष्टता, ज्ञान पानेकी इच्छा न होना (जिस कारण विद्या (विशुद्ध ज्ञान) न मिल पाना), असत्य आचरण करना एवं क्रोध करना ये दस अवगुण हैं जो मनुष्यको अधर्मकी ओर प्रवृत्त करते हैं । इन दोषोंको दूर करने हेतु स्वयंके मनका निरंतर अभ्यास करना चाहिए एवं स्वयंमें अपेक्षित परिवर्तन हेतु स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया आरम्भ करनी चाहिए, तभी ये दोष दूर हो सकते हैं; क्योंकि ये दोष अनेक जन्मोंके कुसंस्कारका परिणाम होते हैं । जो इन्हें दूरकर, दस दिव्य लक्षणोंको स्वयंमें आत्मसात कर लेता है, वह धर्मके ज्ञानका अधिकारी हो जाता है । ऐसे व्यक्तिको धर्मके संरक्षक, जो साक्षात श्रीविष्णु हैं, (वे) स्वयं ही उनके अन्तर्चक्षुको जागृतकर धर्म या विद्या या आत्मज्ञानके स्थूल एवं सूक्ष्म ज्ञान दे देते हैं । – तनुजा ठाकुर
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