स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया करनेसे अन्तर्मुखतासे वृद्धि होती है, इससे हमें ज्ञात होता है कि हम ईश्वरसे इतने दूर क्यों है ? उपासनाकी साधिका, जो बहुत ही उत्साह एवं प्रमाणिकतासे यह प्रक्रिया कर रही हैं, उन्होंने बताया कि मुझे ज्ञात हो गया है कि ईश्वरने मुझपर अभी तक अपनी कृपादृष्टि क्यों नहीं बरसाई ? मैं तो दोषोंकी एक पुंज हूं, मुझमें इतना अहं है, ऐसेमें मुझपर ईश्वरीय या गुरुकृपाका संचार कैसे हो सकता है ? जिस दिवस साधकने मनमें यह भाव आ जाए और वह अपने दोषोंसे उत्पन्न होनेवाले चूकोंको स्वीकार कर उसमें अपेक्षित सुधार करने लगे उसपर गुरुकृपाका प्रवाह आरम्भ हो जाता है । इसप्रकार ईश्वरीय कृपा हेतु अन्तर्मुखता अति आवश्यक है एवं स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया आत्मनिरीक्षणकी प्रक्रियाको गति देकर हमारी वृत्तिको बहिर्मुखसे अन्तर्मुख करती है । यहींसे साधनाका शुभारम्भ होता है । – तनुजा ठाकुर (२५.९.२०१७)
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