जबतक किसी साधकका आध्यात्मिक स्तर ८० प्रतिशत नहीं हो जाता है, तब तक उसकेद्वारा किए गए प्रत्येक अनुचित कर्मका फल उसे पापकर्मके रूपमें, या तो इस जन्ममें या अगले जन्ममें भोगना ही पडता है; इसलिए साधनाके कालमें साधकद्वारा जाने-अनजाने कोई बडी चूक हो जाए तो उसने उस पापके क्षालन हेतु त्वरित ही प्रायश्चित लेना चाहिए और प्रायश्चित भी ऐसा होना चाहिए, जिससे उसकेद्वारा किया गया अनुचित कर्मका कर्मफल यदि पूर्णत: नष्ट न हो सके तो कमसे कम वह न्यून अवश्य हो सके एवं पुनः उसीप्रकारकी चूककी पुनरावृत्ति न हो; परन्तु यह तभी सम्भव होता है जब साधक अपनी आध्यात्मिक यात्राकी आरम्भिक कालसे ही अन्तर्मुख रहे एवं सतत आत्मनिरिक्षण कर सके ।
आज समाजमें गुरु पदके अधिकारी न होते हुए भी अनेक साधक अपने अहंकी तृप्ति हेतु गुरुपदपर विराजमान होकर समाजको दिशाहीन कर रहे हैं । ऐसे साधकोंकी वृत्ति बहिर्मुख होती है, वे अपने अनुचित कृत्योंसे समाजकी हानि तो करते ही हैं, स्वयंकी हानि अधिक कर लेते हैं ।
स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया एक बार अन्तर्मनमें अंकित हो जाए तो साधककी वृत्ति अन्तर्मुखी हो हाती है, ऐसेमें वह अपना आत्मनिरिक्षण करता ही रहता है और वह अपने षड्रिपुओंपर नियन्त्रण पानेका प्रयास करता है और यदि जाने-अनजाने उससे कोई भूल हो जाती है तो वह कठोर प्रायश्चित लेकर अपने पापोंका क्षालन करता है; अतः साधना कालमें साधकद्वारा अपने संस्कारोंके कारण होनेवाले क्षम्य एवं अक्षम्य चूकोंसे निर्माण होनेवाले पापकर्मके परिमार्जन हेतु यह प्रक्रिया परम आवश्यक है । ध्यान रहे, यदि कोई साधक बहिर्मुख होकर पापकर्म करता ही जाता है तो ईश्वर उन्हें कठोर दण्ड देते हैं; इसीलिए इससे पूर्व कि हमें ईश्वरकी अवकृपा मिले हमने स्वयं ही अपने पापोंका प्रायश्चित कर लेना चाहिए और स्वाभावदोष प्रक्रिया यही सिखाती है ।
*यदि आप इस प्रक्रियाको सीखने हेतु इच्छुक हैं तो आप हमारे व्हट्सऐप्पके साधना गुटमें जुड सकते हैं । इस हेतु आप हमें नीचे दिए गए चलभाष क्रमांकपर अपना सन्देश भेज सकते हैं । – तनुजा ठाकुर (२९.९.२०१७)
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