मनकी एकाग्रतामें सहायक है स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया
कोई भी साधक साधना क्यों करना चाहता है ?, यदि हम इस प्रश्नका उत्तर किसी साधकसे पूछेंगे तो वह उत्तर देगा, मनकी एकाग्रता साध्य करने हेतु वह साधना करता है ।
अनेक साधक नामजप, ध्यान, त्राटक इत्यादिद्वारा मन एकाग्र करनेका प्रयास करते हैं, किन्तु वे अध्यात्मविदोंको बताते हैं कि मन एकाग्र करते समय उनके मनमें अनावश्यक विचार आते हैं । यदि साधक अपने अनावश्यक विचारोंका अभ्यास करे तो उसे ज्ञात होगा कि उसके जो भी संस्कार केंद्र तीव्र होते हैं, उसीसे सम्बन्धित विचार साधनाके मध्य उसे अधिक आते हैं । जैसे यदि किसीमें मायाके प्रति आसक्ति अधिक है तो उसे अपने पिता, पुत्र, बहन इत्यादिके भूतकाल या भविष्यके सम्बन्धमें विचार आयेंगे । यदि किसीमें क्रिकेट देखनेका संस्कार प्रबल हो तो उसे साधनाके समय उसप्रकारके विचार अधिक आएंगे । अर्थात जो भी संस्कार केंद्र तीव्र हों उसके विचार अधिक आते हैं और यही मनका मुख्य गुणधर्म है ।
यदि साधक साधनाके साथ ही अपने मनके आनेवाले विचारोंका अभ्यास करे, और अमुक विचार दिनमें किस समय आया और कितनी बार आया?, यह लिखनेका प्रयास करे और उसे दूर करने हेतु स्वयंसूचना दे तो उस विशिष्ट संस्कारसे सम्बन्धित विचार शीघ्र न्यून हो जाएंगे एवं इससे साधना करते समय मनकी एकाग्रताको साध्य करना सरल होता है; अतः साधकने दिन भरमें आनेवाले विचारोंका अभ्यास कर उसे अपनी स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियाकी अभ्यासपुस्तिकामें लिखना चाहिए एवं योग्य उपाययोजना करना चाहिए । इसप्रकार स्वभादोष निर्मूलन प्रक्रियाका यदि जोड हम अपनी साधनाके साथ दें तो वह साधना हेतु पूरक सिद्ध होता है एवं साधक द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति करता है, जो उसके जीवनका मुख्य लक्ष्य होता है ।
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– तनुजा ठाकुर (२.१०.२०१७)
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