साधको, अपनी भावनाप्रधानता रुपी दुर्गुणको शीघ्र दूर कर आगामी आपातकालकी करें पूर्व सिद्धता !
अनेक साधक अत्यधिक भावनाप्रधान होते हैं, स्वयंके जीवनमें घटित होनेवाले प्रसंगोंसे तो वे अत्यधिक व्यथित हो ही जाते हैं, अपने मित्र या परिजनको भी यदि कोई दुःख हो तो वे अवसादग्रस्त या अत्यधिक विचलित हो जाते हैं । आनेवाला काल भीषण है; अतः उस कालमें प्रत्येक दिवस अनेक मानसिक संताप देनेवाले समाचार सभीको प्राप्त होंगे जो हमारे ही पडोसी, मित्र, शुभचिन्तक एवं परिजनोंके होंगे, जैसे एक ही दिवसमें किसी प्रिय मित्रका अपघातमें हाथ-पांवका टूट जाना और चिकित्सालयमें अति दक्षता विभागमें भर्ती हो जाना, किसीका घर बाढके अनियंत्रित जलसे उद्ध्वस्त हो जाना, किसीका साम्प्रदायिक उत्पातके कारण लापता हो जाना, किसीके घर दो या तीन सदस्योंको गोली लग जाना, किसीका भूकम्पमें कई दिनोंतक फंसे रहना इत्यादि । अर्थात सर्वत्र त्राहिमांकी स्थिति होगी, यह एक या दो दिवसों तक नहीं होगा अपितु चारसे पांच वर्ष चलेगा । आज यदि आप एक दु:खद घटनासे विचलित हो जाते हैं तो आनेवाले कालमें आपकी स्थिति क्या होगी ?, किंचित सोचें !
आगामी कालकी भीषणता इतनी अधिक है कि कई सन्तों और द्रष्टाओंने उस कालसे पूर्व देह-त्याग हो जाए ऐसी भी इच्छा व्यक्त की है एवं कुछने तो देहत्याग कर भी दिया है । यह मैं आपको भयभीत करने हेतु नहीं कह रही हूं, आपको मात्र सतर्क कर रही हूं । समय रहते अपनी भवनाप्रधानता, मोह, आसक्ति इत्यादि रुपी दोषपर मात पानेका प्रयास करें एवं निर्विकल्प होकर अधिकसे अधिक समय योग्य प्रकारसे व्यष्टि एवं समष्टि साधना, सन्तोंके मार्गदर्शनमें करें !
जिस स्थितिपर हमारा नियंत्रण नहीं होता, वहां साक्षी भाव रखना सीखें, यह गुण शीघ्र आत्मसात करें एवं प्रत्येक प्रसंगमें अपने मनपर नियन्त्रण रखकर, सहज होकर साधनारत रहें । आगामी आपातकालका एकमात्र कवच साधना और साधना ही है अतः धन, घर और मान-सम्मानका संचय करनेकी अपेक्षा साधनाका संचय करें, अब अधिक समय नहीं बचा है !
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– तनुजा ठाकुर (६.१०.२०१७)
Ye samay kitne vars me ayega