विश्वमें केवल सभी धर्मोंका अभ्यास न किए हुए हिन्दू ही ‘सर्वधर्मसमभाव’ शब्दका प्रयोग करते हैं। शेष किसी धर्ममें कोई एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं कहता । हिन्दुओंके यह ध्यानमें नहीं आता कि, ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहना अज्ञानताकी परिसीमा है, ‘प्रकाश तथा अन्धकार समान है,’ ऐसा कहनेके समान है – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
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