सन्यासी क्यों करे स्वाभाव दोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – २)


पूर्णत्वकी प्राप्ति हेतु करें यह प्रक्रिया
संन्यास धारण करनेवाला जीव ईश्वरसे पूर्ण एकरूपताकी इच्छा रखता है; तभी वह मायाके सर्व बन्धनोंका परित्याग कर, एक चुनौतीपूर्ण मार्ग तब चुनता है, जब उसने ईश्वरको देखा या जाना नहीं होता है । इस व्रतको लेनेके पश्चात् वह पूर्ण उत्कंठासे साधना करता है, इसी क्रममें उसे अत्यन्त कष्ट या विपरीत परिस्थितयोंका सामना भी करना पडता है, तब भी खरा मुमुक्षु अपने ध्येयके प्रति एकनिष्ठ होनेके कारण, वह सर्व बाधाओंको पार करता हुआ इस मार्गपर आगे बढता है ।
मुक्तिके अनेक प्रकार हैं, इसमें सर्वश्रेष्ठ मुक्तिको सायुज्य मुक्ति कहते हैं, जिसमें ईश्वरसे पूर्ण एकरूपता साध्य होती है; किन्तु इस मुक्तिको साध्य करने हेतु साधकमें लेशममात्र भी इच्छाएं, वासनाएं या अहंके संस्कार नहीं होने चाहिए तो ही वह निर्गुण, निराकार परमेश्वरसे एकरूप हो सकता है ।
मोक्षप्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले साधकने इसीलिए अपने सभी तीव्र विषय-वासनाओंकी एक सूची बनाकर उनसे किस प्रकार मुक्ति मिल सकती है, यह प्रयास करना चाहिए । इस हेतु साधनाके आरम्भिक कालमें प्रत्याहार एक उत्तम उपाय है; किन्तु इससे अन्तर्मनसे संस्कार नष्ट नहीं होते हैं, मात्र चित्तकी वृत्तियोंका निरोध होता है एवं मोक्षप्राप्ति हेतु चित्तके वृत्तियोंका निर्मूलन परम आवश्यक है । चित्तकी वृत्तियोंका निर्मूलन हेतु अपने चित्तके संस्कारोंपर गूढ अभ्यास कर, उसे दूर करने हेतु प्रयास करना चाहिए । चित्तके संस्कारोंके निर्मूलनमें स्वभावदोष अत्यन्त सहायक सिद्ध होती है, ऐसा मेरा अनुभव है । चित्तके संस्कारोंके निर्मूलनके बिना सायुज्य मुक्ति असम्भव है और ऐसी सर्वश्रेष्ठ मुक्ति हेतु समष्टि साधना, अत्यन्त सहायक सिद्ध होती है या ऐसा कह सकते हैं समष्टि साधना करनेवालेको सायुज्य मुक्ति सहजतासे प्राप्त होती है । समष्टिमें रहनेसे साधकको अपने दोषोंका भान शीघ्र होता है; इसीकारणसे आश्रमका निर्माण किया गया एवं ब्रहमचारी, वानप्रस्थी तथा संन्यासियोंको साधनाके आरम्भिक कालमें एक सात्त्विक कुटुम्ब व्यवस्थामें रहनेसे उसे अपने सह-साधकोंके प्रयासोंसे उत्साहवर्धन होता है एवं समष्टिमें दोषोंका प्रकटीकरण सहज होता है जो  उसे उसकी दोषोंका भी सहज भान करानेमें सहायक सिद्ध होती  है ।
साधना प्रगल्भ होनेपर वृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है एवं तभी एकान्तवासका यथार्थमें लाभ प्राप्त होता है । संन्यासियोंने साधनाके आरम्भिक कालमें इसीलिए गुरु या अध्यात्मविदके शरणमें रहकर दोष एवं अहं निर्मूलनकी प्रक्रियाको सीखकर लेना चाहिए । यह प्रक्रिया नूतन नहीं, आदिकालसे मुमुक्षुओंद्वारा की जा रही है और इस प्रकियामें सातत्य रखनेवालोंको ईश्वरसे पूर्ण एकरूपता अवश्य ही साध्य होती है । – तनुजा ठाकुर (१०.१०.२०१७)



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