प्रार्थना ईश्वरसे संवाद साधनेका है एक उत्तम साधन
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। भावेषु विद्यते दैवस्तस्माद् भावो हि कारणम् ।।
देवता न तो काष्ठमें विद्यमान रहता है, न पाषाणमें और न ही मिट्टीकी मूर्तिमें, देवता भावमें (श्रद्धामें) रहते हैं; अत: भाव ही कारण है ।
आजसे हम प्रतिदिन भाव जागृति हेतु साधक क्या प्रयास कर सकते हैं ?, इस हेतु छोटे-छोटे प्रयासोंके विषयमें जानेंगे; क्योंकि अध्यात्ममें श्रद्धा और भावका ही सिक्का चलता है । साधकका भाव जितना अधिक होता है, वह अध्यात्ममें उतनी ही द्रुत गतिसे प्रगति करता है । दोष निर्मूलनकी प्रक्रिया कठिन होती है, इसमें सातत्य बनाए रखने हेतु यदि साधक साथ ही साथ भाव जागृति हेतु नियमित प्रयास करे तो उसके लिए यह प्रक्रिया सुसह्य एवं परिणामकारक हो जाती है ।
भाव जागृति हेतु अपने अन्तर्मनमें प्रार्थनाका संस्कार अंगीकृत करें । प्रार्थना, ईश्वरसे संवाद साधनेका एक उत्तम माध्यम है । जैसे एक पुत्र या पुत्रीको अपनी मातासे संवाद साधने हेतु कोई नियोजित शब्द नहीं चाहिए होता है, वैसे ही प्रार्थना आपके और आपके आराध्यके मध्यकी एक सुन्दर आध्यात्मिक कडी होती है । (क्रमश:)
(निकट भविष्यमें हम ‘श्रव्य धर्मधारा सत्संग’में इस विषयपर भी सत्संग लेंगे ।)
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