इस प्रक्रियाको करने हेतु प्रतिदिन अपनी चूकें (गलतियां) एक अभ्यासपुस्तिकामें लिखना एवं उसे समष्टिमें साझा करना, यह स्वभावदोष प्रक्रियाका प्रथम चरण है । मात्र चूकें लिखनेसे मनके दोष न्यून नहीं होते हैं, अपितु मनको योग्य दिशा देने हेतु उसे निर्देश देने पडते हैं जिसे स्वयंसूचना कहते हैं । स्वयंसूचना अर्थात मनको यह सूचना देना कि विशिष्ट दोष घटित होते समय या उससे पूर्व मनने किस प्रकार आचरण करना चाहिए । इसे समझने हेतु आप ‘सनातन संस्था’द्वारा प्रकाशित स्वभावदोष निर्मूलनसे सम्बन्धित ग्रन्थ पढ सकते हैं । इसे आप सनातन संस्थासे निकटवर्ती केंद्रसे या हमसे या ऑनलाइन ‘www.sanatanshop.com’से प्राप्त कर सकते हैं । साथ ही, शीघ्र ही हम धर्मधारा श्रव्य सत्संगमें इस विषयका पुनः प्रसारण करनेवाले हैं । – तनुजा ठाकुर (१४.१०.२१०७)
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