त्याग एवं प्रीतिका सीधा सम्बन्ध साधकत्वसे होता है, जिसमें त्याग व प्रीति (निष्काम प्रेम) जितना अधिक होता है, वह उतना ही अच्छा साधक होता है । साधक, अपने तन, मन, धन, प्राण, बुद्धि एवं अहंका त्याग अत्यन्त सहजतासे ईश्वरप्राप्ति हेतु करता है एवं प्रीतिके गुणके कारण उसमें समष्टि भाव होता है; अतः वह धर्म रक्षण या धर्मशिक्षणका कार्य करता है और ये कृत्य, उसके साधकत्वका परिचय देता है । जब यही त्याग ५५ % तक पहुंच जाता है तो कोई गुरु उस साधकको अपने शिष्यके रूपमें स्वीकार कर लेते हैं और जब त्याग एवं प्रीतिका प्रमाण ७० % तक पहुंच जाता है तो वह सन्त पदपर आसीन हो जाता है । द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति हेतु कलियुगमें त्याग एवं प्रीतिका सर्वाधिक महत्त्व है; क्योंकि कलियुगके अधिकांश जीवोंमें यह प्रवृत्ति नगण्य ही होती है; अतः इस घटकका आध्यात्मिक स्तर बढाने हेतु या द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति करने हेतु विशेष महत्त्व है ।- तनुजा ठाकुर
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