अनुशासनहीनता
अपने स्वाभावदोष, अनुशासनहीनताको दूर कर समष्टिके बनें प्रिय पात्र !
अध्यात्ममें शीघ्र प्रगति हेतु एक अति आवश्यक गुण है अनुशासनबद्धता । जो साधक आश्रममें रहते हैं, उन्होंने कार्यपद्धतिका पालन करना चाहिए, यह भी अनुशासनबद्धताका ही भाग है और जो गृहस्थ अपने घरमें रहकर साधना करते हैं उन्होंने अपनी दिनचर्या बनानी चाहिए एवं उसका यथासम्भव पालन करना चाहिए । अपनी दिनचर्यामें दो तथ्योंका निरिक्षण करना चाहिए एक तो यह कि उनकी दिनचर्या वैदिक संस्कृति अनुसार हो एवं प्रत्येक तीन माहमें उनकी दिनचर्यामें साधनाकी उत्कंठाकी झलक बढती हुई दिखाई देती है या नहीं !
अनुशासनबद्धतासे मन निर्धारित एवं नियोजित अनुशासन अनुसार चलने हेतु बाध्य होने लगता है एवं यहींसे अनियन्त्रित मनपर अंकुश लगना आरम्भ होता है ।
वैदिक संस्कृति अनुसार प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्तमें उठना, नित्य योगासन प्राणायाम करना, स्नान आदि करनेके पश्चात् पूजा-अर्चना-आरती कर नामजप करना यहांसे दिनचर्याका क्रम आरम्भ होना चाहिए । अनुशासनहीन साधक अध्यात्ममें शीघ्र प्रगति नहीं कर पाता है, ऐसा मैंने अपने अनेक वर्षोंकी समष्टि साधनाके मध्य रहनेके पश्चात् पाया है; अतः साधनामें द्रुत गतिसे प्रवास हेतु अनुशासनबद्ध होना आवश्यक होता है । आश्रममें रहनेवाले अनुशासनहीन साधक जो कार्यपद्धतिका पालन नहीं करते हैं, उनके कारण अन्य साधकोंको अनेक बार कष्ट होता है – तनुजा ठाकुर (२४.१२.२०१७)
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