ग्रहणकालमें करें धर्माचरण !


साधकों ! धर्मशास्त्रकी प्रत्येक कृति अपनी आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक होती है, यह जानकर ग्रहणकालकी कृति करें ! इस आलेखानुसार कृति करना साधकोंके लिए निम्न कारणोंसे लाभदायक है ।
१. व्यष्टि साधनाके सन्दर्भमें होनेवाला लाभ : धर्मशास्त्रानुसार प्रत्येक कृति करना ही अपनी साधना है । ग्रहणकालमें की जानेवाली कृतियोंका पालन करते हुए साधना करनेसे ग्रहणकालमें साधनामें आनेवाली अडचनें दूर होती हैं । इस हेतु ग्रहणके आरम्भ होनेसे लेकर ग्रहण समाप्त होनेतक अखण्ड साधनारत रहना आवश्यक है ।
२. समष्टि साधनाके सन्दर्भमें होनेवाला लाभ : धर्मशास्त्रानुसार किया जानेवाला साधकोंका आचरण समाजके सामने भी आदर्श प्रस्तुत करता है तथा समाज भी उसीप्रकार धर्माचरण करनेको प्रवृत्त होता है ।
उपरोक्त दोनों प्रकारके लाभ ध्यानमें रखते हुए साधक धर्मशास्त्रानुसार ग्रहणकालकी प्रत्येक कृति करें ! (३.४.२०१५)

उपर्युक्त अमृतवचनके भावार्थका पालन आगामी ग्रहणकालमें साधक कर सकते हैं; अतः इसे आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूं ।

साधको, ग्रहणकालमें क्या करें तथा क्या नहीं करें, इस सम्बन्धमें निम्नलिखित जानकारी संग्रहित कर रख लें !
सूर्य-चन्द्र ग्रहणमें पवित्र होकर पुण्यकार्य किए जाते हैं एवं अपवित्रता देनेवाले अथवा शारीरिक क्रियाओंमें संचालन करने सम्बन्धी भोजनादि कर्म निषिद्ध माने जाते हैं । इसके विपरीत कार्य करनेसे शारीरिक तथा मानसिक क्रियाओंमें अडचने आ सकती हैं ।
१. क्या करें ?
अ. ग्रहणके वेध लगनेपर स्नान, मध्याह्नकालमें होम-हवन, देवपूजा एवं श्राद्ध तथा अन्तमें शरीरपर धारण किए गए वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिए । स्त्रियां सिरपर जल डाले बिना, शरीरका स्नान कर सकती हैं । इस स्नान हेतु उष्णजलके स्थानपर ठण्डा जल, ठण्डा जल दूसरेके हाथोंसे प्राप्त न कर स्वयं लिया हुआ जल, स्वयं लिए जलसे भी अधिक भूमिगत जल, उससे अधिक बहता जल, बहते जलसे अधिक सरोवरका जल, उससे अधिक नदीका जल, अन्य नदियोंसे अधिक गंगा तथा गंगासे भी अधिक समुद्रका जल पवित्र माना जाता है ।
आ. सूर्यग्रहणमें ग्रहणके चार प्रहर तथा चन्द्रग्रहणमें ग्रहणके तीन प्रहरके पूर्व भोजन करना वर्जित है । वयोवृद्ध, बालक एवं रुग्ण ग्रहण लगनेके १ प्रहर पूर्वतक भोजन ग्रहण कर सकते हैं । ग्रहण पूर्ण होनेपर सूर्य अथवा चन्द्र जिसका ग्रहण हो, उसके शुद्ध बिम्बका दर्शनकर भोजन ग्रहण करना चाहिए । (१ प्रहर = ३ घण्टे)
इ. ग्रहणकालमें मनसे सत्पात्र व्यक्तिके नामसे पानीमें जलाञ्जलि देनी चाहिए, ऐसा करनेसे देनेवालेको पुण्यलाभ होता है तथा लेनेवालेको उसका दोष नहीं लगता ।
ई. ग्रहणके वेध लगनेसे पूर्व जिस पदार्थमें तिल अथवा दर्भ डाल रखा हो, वे पदार्थ दूषित नहीं माने जाते । ग्रहणके वेध लगनेके प्रारम्भमें तिल अथवा दर्भ मिश्रित जलका उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थितिमें ही करें ! ग्रहणपूर्व पकाया भोजन ग्रहण न करें, उसे गाय अथवा कुत्तेको दें ! नया भोजन बनाएं ! ग्रहण शुरू होनेसे अन्त होनेतक अन्न-जल ग्रहण न करें !
उ. ग्रहणकालमें गायको चारा, पक्षियोंको दाना, दरिद्रोंको वस्त्रदान करनेसे अनेक गुणा अधिक पुण्य लाभ होता है ।
ऊ. ग्रहणपूर्व तीन दिन अथवा ग्रहणके दिन उपवासकर स्नान-दान करनेसे महापुण्य लाभ होता है । (जिन्हें सन्तति प्राप्त है, ऐसे गृहस्थ ग्रहणके दिन एवं संक्रान्तिपर उपवास नहीं करें)
२. क्या नहीं करें !
अ. ग्रहणके दिन फूल, पत्ते, घास, लकडी इत्यादि नहीं तोडें ! गीले बालोंको न झटकें, कपडे न निचोडें एवं दातून नहीं करें ! ग्रहणकालमें ताला खोलना, नींद लेना (सोना), मल-मूत्र त्याग, मैथुन तथा भोजन करना इत्यादि वर्जित है ।
आ. ग्रहणकालमें कोई भी शुभकर्म नहीं करें तथा किसी नए कार्यका आरम्भ नहीं करें !
इ. ग्रहणके पश्चात् स्नानके समय किसी भी मन्त्रका उच्चारण नहीं करना चाहिए ।
ई. स्कन्दपुराणानुसार ग्रहणकालमें दूसरेका अन्न ग्रहण करनेपर बारह वर्षोंका संचित पुण्य नष्ट होता है ।
उ. देवी भागवतानुसार भूकम्पके होते समय तथा ग्रहणकालमें धरती नहीं खोदें !
ऊ. ग्रहण समाप्त होनेके पश्चात् सम्पूर्ण घरको गंगाजलसे शुद्ध करना चाहिए और अधिकसे अधिक नामजप करना चाहिए।

 



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