प्रार्थना – भावजागृतिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग – १२)


यदि हम अपने प्रत्येक कृत्यको ईश्वरको साक्षी मानकर, उन्हें स्मरण करके एवं उन्हें जैसा अपेक्षित है, वैसा करते हैं तो उसीको भाव कहते हैं और साधनामें इसका अत्यधिक महत्त्व है; अतः अपनी दिनचर्याकी प्रत्येक कृतिमें ईश्वरकी अनुभूति कैसे ले सकते हैं ?, यह चरण-दर-चरण हम सीखेंगें और इससे हमारे जीवनको एक नूतन दिशा ही नहीं मिलेगी, अपितु इस संसारमें रहते हुए हमारा मन एक ऐसे संसारमें रममाण हो जाएगा, जहां प्रारब्धवश हमारे शरीर और मनको दुःख होनेपर भी वह हमें स्पर्श नहीं कर सकता और हम उस ईश्वरीय अनुसन्धानमें रहनेसे, हमसे पापकर्म भी घटित होनेके प्रमाण न्यून होते चले जाएंंगे और इसप्रकार हम एक आदर्श जीवनका निर्वाह करते हुए साधनारत रह सकते हैं और ‘प्रार्थना’ मात्र भाव जागृतिका एक महत्त्वपूर्ण चरण ही नहीं है, अपितु वह निर्गुण निराकार परमेश्वरसे अपना सम्बन्ध स्थापित करनेका एक सरल सुन्दर आध्यात्मिक माध्यम है । तो आइए, इस सम्बन्धमें आजकी दिनचर्याके मध्य की जानेवाली एक प्रार्थनाके विषयमें जानें । स्वस्थ रहने हेतु प्रतिदिन कमसे कम २० मिनट योगासन या व्यायाम एवं प्राणायाम अवश्य करें; क्योंकि शरीर ही ईश्वरप्राप्ति एवं समाज कल्याण दोनोंका साधन है; अतः इसे स्वस्थ रखना अति आवश्यक है ! योगासन एवं प्राणायामसे हमारी स्थूल देह एवं मनोदेहकी (मनकी) ३०% तक शुद्धि होती है और ये दोनों साधना हेतु पूरक और पोषक बनते हैं; अतः इसे अपनी दिनचर्याका अविभाज्य अंग बनाएं । इस कृत्यको करनेसे पूर्व इसप्रकार प्रार्थना करें –
‘‘हे प्रभु ! योगासन (व्यायाम) एवं प्राणायामको करते समय हमारे शरीरमें स्थित प्रत्येक कोशिकामें जो भी काली शक्ति, अनिष्ट शक्तियोंने निर्मित की है या रज-तम प्रधान दिनचर्याके पालनसे या वातावरणसे या भोजनसे निर्मित हुई हो, उसका विघटन होने दें तथा हमारी यह देह साधना हेतु पोषक एवं बलिष्ठ (शक्तिशाली) बने एवं हम दिनचर्याकी इन क्रियाओंको नियमित कर सकें, ऐसी आप कृपा करें ।’’



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