स्वभावदोष निर्मूलन सम्बन्धी कुछ दृष्टिकोण


अ. कुछ लोग कहते हैं कि मुझसे कोई चूक (गलती) होती ही नहीं है; अतः मैं अपनी चूकें कैसे लिखूं ?
दृष्टिकोण : जब तक मनका पूर्ण लय नहीं होता तब तक विषय-वासनाओंके संस्कार रहते ही हैं और पूर्ण मनोलयवाले सन्त सम्पूर्ण विश्वमें जितनी हमारी अंगुलियां है उतने भी नहीं हैं ।
मनके संस्कारोंका प्रकटीकरण गुण-दोषके रूपमें होता है; अतः यह कहना कि मुझसे कोई चूक होती ही नहीं है सर्वथा अनुचित है । सामान्यतः बहिर्मुख प्रवृतिके लोग स्वयंके विषयमें अपने मनमें एक

भ्रामक छवि बनाकर रखते हैं और अपने अहंकी पुष्टि हेतु मुझसे कोई चूक नहीं होती है एवं मुझमें कोई दोष नहीं है, ऐसा सोचते हैं । ऐसे लोगोंकी वृत्ति जबतक अन्तर्मुख नहीं होती है, उन्होंने अपनी चूकें अपने घरके सदस्योंसे या सहसाधकोंसे पूछनी चाहिए । चाहे आपके साथ रहनेवाले लोगोंकी वृत्ति कितनी भी बहिर्मुख हो, जब उन्हें दूसरोंकी चूकों बताने हेतु कहा जाता है तो वे आपको, आपकी दस चूकें त्वरित गिना देंगे ।
ऐसी स्थितिमें दूसरोंद्वारा बताई गई चूकोंको सर्वप्रथम मौन होकर सुनना चाहिए; किन्तु बहिर्मुख प्रवृतिके व्यक्तिसे यह भी नहीं होता है, उसे न अपनी चूकें दिखाई देती हैं और न ही उन्हें दूसरोंद्वारा बताई गई चूकें स्वीकार्य होती हैं, वे त्वरित बताई गई चूकोंपर अपना स्पष्टीकरण देते हुए कई बार तो किसी और व्यक्तिको या परिस्थितिको उत्तरदायी ठहरा देते हैं; किन्तु मुझसे यह चूक हुई यह कदापि स्वीकार नहीं करते । यदि आपकी भी स्थिति ऐसी ही है तो सावधान हो जाएं ! आपकी भी वृत्ति बहिर्मुख है और आपमें अहंका प्रमाण अधिक है । यदि ऐसा हो तो ईश्वरसे प्रार्थना करें कि हे प्रभु ! मेरे अहम् और दोषोंका मुझे भान होने दें, मैं अपनी दिनचर्याके मध्य होनेवाली चूकोंको ढूंढ सकूं एवं यदि कोई मेरी चूक बताए तो उसे स्वीकार कर सकूं, ऐसी आप कृपा करें !
मैंने पाया कि अधिकांश मनोरोगियोंमें अहम् अधिक होता है और वे अपनी चूकें स्वीकार नहीं कर पाते हैं, उन्हें ऐसा लगता भी नहीं है कि उनमें अहंका प्रमाण अधिक है । आज समाजमें मनोरोग बढनेका मुख्य कारण अपने दोष और अहंकारपर ध्यान न देना भी है ।
विनम्र जीवको अपनेमें अत्यधिक दोष और अहंकार दिखाई देता है, वह स्वयंद्वारा हुई चूकोंपर स्वयंप्रेरित होकर उसे स्वीकार करता है एवं कोई गम्भीर चूक होनेपर उसे स्वतः ही आत्मग्लानि होती है और वह प्रायश्चित्त भी लेता है । ऐसे जीव सभीके प्रिय होते हैं एवं यदि वे साधना आरम्भ करें तो उनकी शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति भी होती है । – तनुजा ठाकुर



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