वैदिक उपासना पीठ हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके पश्चात आदर्श राष्ट्र रचनाके कार्यमें अपना योगदान देगी। उपासनाके इस कार्यको भविष्यमें करने हेतु आश्रममें दैवी बालकोंका प्रवेश आरम्भ हो गया है, इसमें प्रथम पूर्णकालिक बालक अमेरिकी नागरिक है (वह हिन्दू माता-पिताकी संतान है जिसका जन्म अमेरीकामें हुआ है)। उसके जन्मकी भी कथा रोचक है, उसके माता-पिता सॉफ्टवेयर अभियंता (इंजिनियर) हैं और जब उन्हें लगा कि उन्हें संतानोत्पत्ति करनी चाहिए और उनकी संतान सात्त्विक हो, ऐसी उन्हें इच्छा हुई और उन्होंने यूट्यूबपर यह विषय डालकर उसे ढूंढना आरम्भ किया तो धर्मधारा सत्संगके इस विषयके कारण उनका ‘उपासना’से संपर्क हुआ, इस प्रकार उस बालकने अपने माता-पिताके द्वारा सात्त्विक संस्कार प्राप्त कर जन्म लिया । जब जीवात्मा यह सब जानकर जन्म लेती है तो वह साधना आरम्भ करने हेतु आतुर होती है और अपने माता-पिताको साधना हेतु प्रेरित कर, मात्र २० माहकी आयुमें पूर्णकालिक साधक बन, अमेरिकासे भारत उपासनाके आश्रममें आ गया, उसके माता-पितासे मैंने न कभी बात की थी और न ही कभी मिली थी तब भी वे धर्मधारा सत्संग सुनकर अपना सब कुछ छोडकर आश्रममें सेवा हेतु आ गए ! मैंने उन्हें कहा भी कि प्रथम एक माह आश्रममें आकर रहें और देखें उसके पश्चात निर्णय लें ! ऐसा बोलनेपर भी वे मुझे बिना देखे और उपासनाका आश्रम कैसा है ?, यह जाने बिना अपना सब कुछ छोडकर आ गए। मैंने तो उनका सूक्ष्मसे आध्यात्मिक स्तर जानकर उन्हें आश्रममें आनेकी अनुमति दे दी; किन्तु उनके माता-पिताका यह निर्णय सामान्य व्यक्तिके लिए आश्चर्यका विषय हो सकता है ! वस्तुत: उस बालकने भविष्यमें उपासनाका कार्य करने हेतु ही उच्च स्वर्गलोकसे जन्म लिया है और उसने ही अपने माता-पिताको शीघ्र अति शीघ्र उपासनासे जुडने हेतु सूक्ष्मसे प्रेरित भी किया है और उपासनासे मात्र नौ महीने उसे जुडे हुए हुए हैं और वह द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति कर रहा है, उपासनाके कार्य हेतु जो भी आवश्यक है वह सब अपने माता-पिताको करने हेतु सूक्ष्मसे प्रेरित करता है । ऐसे होते हैं दैवी बालक ! इस बालकके विषयमें और तथ्य आपको शीघ्र ही उपासनाकी मासिक पत्रिकामें बताउंगी ।
वैसे उसके माता-पिता भी उन्नत साधक हैं और उसके पिता पूर्व जन्मोंमें मुझसे जुडकर धर्मकार्य करते रहे हैं; अन्यथा कोई किसीको बिना देखे अपनी लाखोंकी चाकरी (नौकरी) और सारा सुख ऐश्वर्य छोडकर, एक अनजाने आश्रममें कैसे आ सकता है ? अतः यह सब मात्र संयोग नहीं, ईश्वरीय नियोजन है !
माता-पिताद्वारा योग्य साधना एवं धर्माचरण न करनेके कारण, वर्तमान समयमें ८०% बच्चोंको अनिष्ट शक्तियोंके कारण कष्ट है; अतः मैं इस प्रकारके सत्संगको लेने हेतु बाध्य हुई थी और उसका सुफल हमें मात्र दो वर्षोंमें ही प्राप्त होने लगा है, इससे आनंदकी बात और क्या हो सकती है !
जब वर्ष २००९ में मुझे बार-बार ईश्वरीय सन्देश आ रहा था कि स्वतन्त्र रूपसे न्यासकी स्थापना कर धर्मकार्य आरम्भ करनेका समय आ चुका है और मैं इस प्रपंचमें पडने हेतु सिद्ध नहीं हो रही थी तो ईश्वर मुझे बार-बार आश्वासन देते हुए कहते थे कि उपासनाके माध्यमसे सम्पूर्ण विश्वके अनेक साधक प्रवृत्तिके लोग जुडकर साधना करनेवाले हैं; अतः मुझे उनके सन्देशको मान लेना चाहिए; किन्तु उत्तर भारतकी साधकत्वहीनताको मैं अपने श्रीगुरुके मार्गदर्शनमें कार्य करते समय अनुभव कर चुकी थी; अतः मैं ऐसा कोई कार्य करना अर्थात ऊखलमें सिर डालना होगा, यह मुझे लगता था और इसकी मुझे पिछले आठ वर्षोंमें प्रत्यक्ष प्रतीति भी मिल चुकी है ! किन्तु ईश्वरकी दासी हूं और दास कबतक अपने स्वामीकी बात टाल सकता है; अतः दिसंबर २०१० में मुझे उपासनाकी स्थापना करनी ही पडी और आज उनके मिले प्रत्येक सन्देशको सत्य होते देख रही हूं । (१४.५.२०१८)
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