धर्मधारा


आजके लोकतन्त्रमें कोई भी राजनीतिक दल न किसीका शत्रु है न मित्र ! सभी एक ही थैलीके चट्टे-बट्टे हैं। चुनाव पूर्व अन्य राजनीतिक दलोंसे मात्र प्रतिद्वंद्वी होनेका नाटक कर यहांकी जनताको मूर्ख बनाते हैं । सभीका लक्ष्य मात्र और मात्र सत्ता प्राप्त करना होता है, इस हेतु वे किसीके भी साथ हाथ मिला सकते हैं और मिला लेते हैं ! सत्तालोलुपताकी यही परिसीमा वर्ष २०२२ तक लोकतन्त्रके नाशका कारण बनानेवाली है ।



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