कर्मनिष्ठ ब्राह्मणोंकी सम्मान पानेकी इच्छा है विषप्राशन करने समान
मनुस्मृतिके द्वितीय अध्यायमें कहा गया है सम्मानाद्ब्राह्मणो ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत् विषाद इव।अमृतस्येव चाकांक्षदवमानस्य द्विजोत्तम ।।
अर्थात कर्मनिष्ठ ब्राह्मणको सम्मान पानेसे सदा बचना चाहिए और उसे विषतुल्य समझना चाहिए । इसके विपरीत वह अपमानकी सदैव आकांक्षा करे एवं अपमान करनेवालेको क्षमा कर दे ।
इसप्रकार मान-सम्मानसे परे उठकर, साधनारत रहते हुए समाजको साधना पथपर अग्रसर करना, यही ब्राह्मण वर्णका मूल धर्म या कर्तव्य है; इसलिए वह सदैव भिक्षा या दक्षिणापर अपना जीवन व्यतीत करता था एवं समाजमें गुरुस्थानपर विराजमान था । जबसे ब्राह्मण इस मूल सीखको भूल गया है और अपने मान-सम्मान पानेमें लिप्त होने लगा है, तबसे ही उसका पतन आरम्भ हो गया और आज तो अधिकांश जन्मब्राह्मणोंकी स्थिति अत्यन्त दयनीय है । इसके पीछे मूल कारण उसका अपने वर्णधर्मसे विमुख होना ही है । – तनुजा ठाकुर
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