वाणीके अनुसार नामस्मरण चार प्रकारकी होती है – वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा ।
वैखरी वाणीमें नामजपकी विशेषता
१. प्राथमिक अवस्थाके साधकोंका नामजप वैखरी वाणीसे आरम्भ होता है ।
२. जब नामजप हेतु हम क्रियमाणसे प्रयत्न कर नामजप करते हैं तो इसे वैखरी वाणीका नामजप कहा जाता है ।
३. इस जपको सामान्यतः उच्चारण कर या बोलकर किया जाता है ।
४. यदि वैखरी नामजपको उच्चार शास्त्र अनुसार किया जाए तो उससे सुननेवालोंको आनन्द आता है और नामजप करनेवाले साधकका मन भी थोडा एकाग्र रह पाता है । वैखरी वाणीमें योग्य उच्चार शास्त्र अनुसार नामजप कैसे कर सकते हैं ?, यह विषय हम धर्मधारा श्रव्य सत्संगमें अनेक बार ले ही ही चुके हैं । उच्चार शास्त्र अनुसार नामजप करनेसे अनुभूतियां शीघ्र होती हैं; फलस्वरूप नामजपपर श्रद्धा निर्माण होनेमें सहायता मिलती है ।
५. प्राथमिक अवस्थाके साधकोंको नामजपपर उतना विश्वास नहीं होता, उन्होंने किसीसे सुना होता है या कहीं पढा होता है; अतः वे उसे करनेका प्रयास करते हैं । इसलिए वे नामजपको बोलकर या बुदबुदाकर करनेका प्रयास करते हैं और इसी प्रयासमें निरन्तरताके कारण उन्हें अनुभूतियां होती हैं और वह साधनाके अगले चरणमें मार्गक्रमण करने लगता है ।
६. प्राथमिक अवस्थाके साधकोंके मनमें विषय-वासनाओंके अनेक संस्कार होते हैं; अतः नामजप करते समय विचारोंका आना स्वाभाविक है, ऐसेमें वैखरी वाणी अनुसार नामजप करना अधिक फलदायी होता है । – तनुजा ठाकुर (क्रमश:)
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